एक बार फिर डूबा देवीसौड़ पुल। उत्तरकाशी जिले में नाव के सहारे लोग

गिरीश गैरोला /उत्तरकाशी// उत्तरकाशी के चिन्यलीसौड़ का मामला टिहरी झील का जल स्तर पहुंचा उत्तरकाशी  जिले तक 11 वीं बार डूबा देवीसौड पुल आवाजाही के लिए 37 करोड़ की लागत से बन रहा पुल तीन बार एक्सटैन्शन के बाद भी नहीं हुआ तैयार आज भी नाव के सहारे है नदी पार के 50 गांवों की […]

गिरीश गैरोला /उत्तरकाशी//

उत्तरकाशी के चिन्यलीसौड़ का मामला

टिहरी झील का जल स्तर पहुंचा उत्तरकाशी  जिले तक

11 वीं बार डूबा देवीसौड पुल

आवाजाही के लिए 37 करोड़ की लागत से बन रहा पुल तीन बार एक्सटैन्शन के बाद भी नहीं हुआ तैयार

आज भी नाव के सहारे है नदी पार के 50 गांवों की दिनचर्या

एशिया की सबसे बड़ी टिहरी बांध परियोजना भले ही देश की ऊर्जा और सिंचाई की जरूरत पूरी कर रही हो किन्तु उत्तरकाशी से लगे दिचली–गमरी के करीब 50 गांव आज भी काला पानी  की सजा भुगत रहे हैं।झील का जल स्तर बढ़ने से चिन्यलीसौड के देवीसौड मे पुल झील मे डूब जाता है और करीब 4–6 महीनों तक लोगों की दिनचर्या नाव के ही सहारे ही चलती है।

इसी स्थान पर 37 करोड़ की लागत से बन रहे पक्के पुल की सुस्त निर्माण गति से ग्रामीणों की समस्या दिन प्रति दिन बढ़ रही है।

टिहरी बांध  परियोजना का जलाशय टिहरी के घनसली से लेकर उत्तरकाशी तक करीब 42 किमी मे विस्तार ले चुका है। वर्ष 2005 के बाद से जब सुरंग के गेट गिरा दिये गए थे, तब से प्रभावित ग्रामीण  बांध से  अपनी समस्याओं के लिए लड़ रहे हैं। किन्तु अभी तक भी समस्या का निदान नहीं हो सका है। झील मे डूबने  वाले गावों के ग्रामीणों को सरकार ऋषिकेश और देहारादून मे विस्थापित कर चुकी है,किन्तु यहाँ  रह रहे लोग झील के चलते कई तरह की समस्या से जूझ रहे हैं। उत्तरकाशी के दिचली–गमरी पट्टी के 50 गांव और टिहरी जनपद के प्रतापनगर के दर्जनों गांव झील से प्रभावित हो रहे हैं

। उनके गांव जिला मुख्यलाय से कई किमी दूर हो गए हैं। चिन्यालीसौड मे देवीसौड पुल के साथ जल समाधि लेने वाली कई दिनों  की हड़ताल के बाद सरकार ने यहां 37 करोड़ की लागत के पुल की स्वीकृति दी गई थी  किन्तु ठेकेदार की  निर्माण की सुस्त गति और नेताओं के ढीलेपन से आज 11 वीं बार फिर से देवी सौड पुल झील मे समा चुका है और लोग फिर से उन्ही समस्याओं को लेकर परेशान हो रहे हैं।

स्कूल आना जाना हो या तहसील–ब्लॉक अथवा जिला मुख्यालय  सब  झील के इस पार ही है। तबीयत बिगड़ने पर बड़े बुजुर्ग हो अथवा प्रसूता महिला, रात बेरात लोगों को इस ओर आने के लिए सुबह नाव का इंतजार करना पड़ता है। नाव की अपनी सीमाए हैं।

वहीं झील के पानी से हो रहे भू स्खलन से नित नए प्रभावित क्षेत्र इसमे जुड़ रहे हैं। नाव तक पंहुच मार्ग और प्लेटफार्म नहीं होने से पैर फिसल कर झील मे समाने का खतरा हर बार बना हुआ है। लेकिन सिस्टम की सुस्ती हैं कि टूटती नही।

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