शिक्षकों की हड़ताल पर सेंसरशिप क्यो?

आई.पी. ह्यूमन,अल्मोड़ा

हम उस देश के वासी है जहाँ संविधान को देश की सबसे बड़ीं विधि माना गया है।संविधान के अंर्तगत देश  के नागरिकों को 6 मूल अधिकार प्रदान किये गए है।जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संघ और संगठन बनाने के आजादी मिली है।जुलूस निकालने,शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की छूट संविधान देता है।इन मूलाधिकारों को प्राप्त करने के लिए ही देश के हर कोने कोने से लोग आजादी की जंग में शहीद हुए।

उत्तराखंड राज्य की प्राप्ति के लिए भी इस राज्य के कई लोग शहीद हुए हैं ।मातृ शक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ है।माताओं बहिनो ने  सिंदूर के साथ साथ अस्मत भी खोई है।आजादी की लड़ाई को देखने और उसमें सरीख होने का हमको अवसर तो नही मिला मगर आजादी के बाद उत्तराखंड आंदोलन को करीब से देखने और उस आग को महसूस करने का अवसर अवश्य ही मिला क्योकि हम आजादी के दशको  बाद पैदा हुए है।

सवाल उठता है कि देश की आजादी के तुरंत बाद ही पृथक उत्तराखंड राज्य की माँग क्यों उठने लगी थी?शैक्षिक, आर्थिक रूप से पिछ्ड़े हुए इस भूभाग में प्रकृति ने बहुत खूबसूरती प्रदान की है ।इसके ऊपर देव् भूमि के रूप में चार धाम यहां विराजमान हैं।लेकिन आजादी से पूर्व और आजादी के बाद तथा 9 नवंबर 2000 को यूपी से पृथक होकर अलग राज्य अस्त्तित्व में आने के बाद भी 18 वर्षों में पृथक राज्य सपनो के अनुरूप ढलता नजर नहीं आ रहा है।खासकर शिक्षा के क्षेत्र में यह प्रदेश एक प्रयोगशाला बनकर रह गया है।शिक्षकों की कमी कभी भी पूरी नहीं हो सकी है।शिक्षा विभाग की हर नीति और शासनादेशों को कोर्ट में चुनौती दी जा रही है और माननीय उच्व न्यायालय  द्वारा ही शिक्षा विभाग में चाहे वो नव नियुक्ति का मामला हो,प्रमोशन का मामला हो,ट्रांसफर पालिसी के अंर्तगत सुगम, दुर्गम का कोटिकरण हो कोर्ट के ही दरवाजे पर जाकर हल हो रहे है ऐसे में चुनी हुई सरकारें अपनी दायित्व से बचती रही हैं।

शिक्षकों की भारी कमी होते हुए भी शिक्षक बच्चों को भोजन कराने के लिए भी बाध्य है।राष्ट्रीय तथा अंतराष्ट्रीय दिवसों को मनाने की सारी जिम्मेदारी भी शिक्षकों के ऊपर है ,आधार कार्ड से लेकर बैंक  खाते भी खुलवाने की जिम्मेदारी शिक्षक के ऊपर है।छात्रवृति का भार भी शिक्षक के ऊपर है।जनगणना से लेकर भवन गणना ,बीएलओ ,दवा खिलाना आदि सब शिक्षकों के ऊपर है बेशक ये सब छात्र हित में है और उसके व्यक्तित्व व शारीरिक विकास के लिए आवश्यक भी हैं मगर इस बीच पठन पाठन में जो व्यवधान होता है उसका असर भी परीक्षा परिणाम पर पड़ता है।कार्यक्रम भी नियत समय पर ,मध्यान्ह भोजन भी नियत समय पर,अन्य अतिरिक्त कार्य भी शिक्षक नियत समय पर करता है। इसमें थोड़ी सी गलती और चूक हुई तो भी फटकार। रिजल्ट खराब तो भी फटकार और दण्डात्मक कार्यवाही।शिक्षक के लिए आगे खाई पीछे कुआं वाली कहावत हो रही है।

विषयों के अध्यापक न होने पर संस्कृत का शिक्षक अंग्रेजी और बायलॉजी का शिक्षक गणित पढ़ायेगा तो फिर बेहतर परीक्षा परिणाम और सीबीएससी जैसे अन्य बोर्डों के साथ उत्तराखंड बोर्ड कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकता है ! ये दयनीय और सोचनीय विषय है।एक ओर शिक्षा का अधिकार अधिनियम और दूसरी तरफ स्कूलों में विषयों के अध्यापक पूर्ण न होना इस अधिनियम की मूल भावना को ही खत्म कर देता है।जब बोर्ड परीक्षा का परिणाम घोषित होता है तो विभाग शिक्षकों के ऊपर बरस पड़ता है और खराब परीक्षा परिणाम के लिए सिर्फ़ और सिर्फ शिक्षकों को ही दोषी करार दिया जाता है।

विरोध का दमन समाधान नहीं 

शिक्षक कई समस्याओं से भी जूझता है वह भी समाज का एक प्राणी है। मात्र मशीन की तरह उसका प्रयोग उसकी मनोस्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।अगर शिक्षक की समस्याएं समाधान का हिस्सा नहीं है तो फिर लोकतंत्र में आजादी का असली स्वरूप क्या रह जायेगा।उत्तराखंड राज्य आंदोलन में कर्मचारियों और शिक्षकों ने भी अपनी नौकरी को दांव पर लगाकर पूर्ण समर्थन दिया था।मगर आज वही कर्मचारी अपनी जायज मांगों और समस्याओं के लिए आवाज उठाते है तो कानून का भय दिखाकर आंदोलन को कुचल दिया जाता है।ताजा उदाहरण राजकीय शिक्षक संघ द्वारा अपनी 18 सूत्रीय मांगों को लेकर निदेशालय में धरना दिया जा रहा था।शासन को पूर्व में उसकी पूरी चरण बद्ध सूचना दी गयी थी।मगर विभाग और शासन ने शिक्षकों के आंदोलन को बार्ता से सुलझाने के बजाए जनहित याचिका के माध्यम से कोर्ट में घसीटा  गया ।और अब आंदोलन में सम्मिलित हुए शिक्षकों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं।शिक्षकों की अन्य वित्तीय मांगों को छोड़ दिया जाए राज्य की वित्तीय हालत को देखते हुए मगर खुद ट्रांसफर एक्ट को वर्तमान सरकार ने अपने घोषणा पत्र में लिखा था।और इसको सदन में भी सरकार ने पारित करा दिया जिसके लिए सभी कर्मचारी संगठनों ने सरकार को धन्यवाद भी दिया और सराहना भी की ।विडंबना तब हुई जब एक्ट के मूल प्रावधानों के अनुरूप ट्रान्सफर आदेश 10 जून तक हो जाने थे लेकिन एक्ट में कैंची लगाकर ट्रान्सफर की सीमा को 10 प्रतिशत कर दिया गया।वो 10 प्रतिशत भी अभी तक नहीं हो सके।शिक्षक से हर कार्य समयबद्व लिया जाता है। मिनटों की देरी पर नप जाने का भय रहता है।खुद नीतिनिर्माता अपनी ही बनाई गई नीति को समय पर लागू नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें किसको दोषी माना जाए।आंदोलन को कुचलने के लिए शिक्षक नेताओं के तुरंत ट्रांसफर करने का आदेश दिया जाता है और हवाला दिया जाता है कि विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है।

सवाल उठता है क्या 3 शिक्षक नेताओं के अचानक ट्रांसफर से पूरे राज्य में कमी पूरी हो गयी?ये नीति और नियत को समझने के लिए पर्याप्त है।बैक डोर से प्रतिनियुक्ति के नाम पर सत्ता के करीबी लोगों को देहरादून मे भेज दिया जाता है और आम शिक्षक ताकता रह जाता है।

जिन शिक्षकों के कंधों पर देश के भावी पीढ़ी को तैयार करने की जिम्मेदारी है वह उपेक्षित और उत्पीड़ित हो रहा है तो कैसे वह अपनी कार्यकुशलता को निभा सकेगा। जहाँ एलटी के शिक्षक के लिए 36 पीरियड और प्रवक्ता के लिए 30 पीरियड का मानक है वही आज एलटी का शिक्षक हफ्ते में 40 से 42 तथा प्रवक्ता 36 से 38 पीरियड का अतिरिक्त भार सहन कर रहा है।प्राइवेट कंपनियों में तक अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त वेतन दिया जाता है मगर यहाँ कोई किसी की सुनने वाला नही है आवाज उठाओ तो एस्मा लगा दिया जाता है और ऐसे हालात अगर इस छोटे से राज्य में अभी से होने लगे हैं तो भविष्य में हालात और नाजुक हो जायँगे और जिसको संभालना फिर मुश्किल हो सकता है।

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