आरटीआइ खुलासा : पूर्व डीजीपी सिद्धू के यौन उत्पीड़न की जांच पर भारी पुलिस की हेकड़ी और हनक

भूपेंद्र कुमार 

 पूर्व पुलिस महानिदेशक डीजीपी सिद्धू के खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच पुलिस अधिकारियों की लापरवाही और हनक के कारण फाइलों में दम तोड़ रही है। यहां तक कि इस जांच के विषय में जब इस संवाददाता ने आरटीआई में जानकारी लेनी चाही तो लोक सूचना अधिकारी और अपीलीय अधिकारियों ने भी यह सूचना उपलब्ध कराने की जरूरत नहीं समझी।
डीजीपी पर यौन उत्पीड़न का है मामला
 गौरतलब है कि दिल्ली निवासी एक महिला ने पूर्व डीजीपी सिद्धू के खिलाफ 5 जून 2017 को शारीरिक शोषण, मृत्यु का भय दिखाने और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोपों के साथ एक तहरीर दी थी। इस तहरीर पर अभी तक जांच नहीं हुई है। इस पर एडीजी अशोक कुमार ने 5 जनवरी 2018 को गढ़वाल रेंज के डीआईजी पुष्पक ज्योति को 1 सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा था।
 जब इस संवाददाता ने 21 फरवरी 2018 को सूचना के अधिकार में जांच रिपोर्ट तथा उससे संबंधित दस्तावेज मांगे तो पहले तो लोक सूचना अधिकारी ने 22 मार्च 2018 को इस सूचना को व्यक्तिगत सूचना से संबंधित बताते हुए सूचना देने से ही मना कर दिया, इस पर 12 अप्रैल 2018 को इस मामले की प्रथम अपील करते हुए पुलिस महानिदेशक से यह भी अनुरोध किया गया कि क्योंकि प्रथम अपीलीय अधिकारी पुष्पक ज्योति ही हैं इसलिए और वहीं सिद्धू प्रकरण की जांच भी कर रहे हैं इसलिए इस अपील की सुनवाई पुष्पक ज्योति के द्वारा न कराई जाए।
 इस पर पुष्पक ज्योति ने भी 8 मई को अपर पुलिस महानिदेशक (प्रशासन) को अपील की सुनवाई खुद से ना कराए जाने के लिए बाकायदा पत्र लिखकर निवेदन कर दिया।
 किंतु अपर पुलिस महानिदेशक प्रशासन आर एस मीणा ने 21 मई 2018 को पुष्पक ज्योति तथा इस संवाददाता की बात को नकारते हुए अपील की सुनवाई के आदेश पुष्पक ज्योति को ही दे डाले और अपने आदेश में कहा कि पुष्पक ज्योति ही अपील की सुनवाई करना सुनिश्चित करेंगे।
 इस पर थक-हारकर यह संवाददाता मुख्य सूचना आयुक्त के पास चला गया और निवेदन किया कि क्योंकि सिद्धू वाले प्रकरण के जांच अधिकारी पुष्पक ज्योति ही हैं और वही इस मामले में अपीलीय अधिकारी भी हैं इसलिए उनसे इस अपील की सुनवाई न कराकर किसी और अधिकारी से कराई जाए।
 मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तराखंड सूचना आयोग की प्रभारी सचिव शालिनी नेगी ने पुलिस महानिदेशक को पत्र भेजकर कहा कि इस प्रकरण में प्रथम अपील की सुनवाई पुष्पक ज्योति से न कराकर किसी और अधिकारी से कराई जाए। तब जाकर पुलिस महानिरिक्षक मुख्यालय/ कार्मिक जी एस मर्तोलिया ने अनंतराम चौहान को आदेश दिए कि वह इस मामले में प्रथम अपील की सुनवाई करना सुनिश्चित करें।
 अनंतराम चौहान अपराध अनुसंधान विभाग मुख्यालय में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर तैनात हैं किंतु उनकी लापरवाही देखिए कि उन्होंने इस प्रकरण को भी गंभीरता से नहीं लिया और उनकी लापरवाही का एक नमूना इस बात से ही दिख जाता है कि पुलिस महानिरीक्षक होते हुए भी उन्होंने अपने पत्राचार के लिए पुलिस उपमहानिरीक्षक गढ़वाल परिक्षेत्र का लेटर पैड इस्तेमाल किया और महा निरीक्षक होते हुए भी उपमहानिरीक्षक के लेटर पैड का इस्तेमाल करते हुए 8 अगस्त 2018 को अपील की सुनवाई करने के लिए इस संवाददाता को पत्र भेजा।
 बड़ा सवाल यह है कि एक वरिष्ठ अधिकारी अपने से कनिष्ठ अधिकारी का लेटर पैड भला कैसे इस्तेमाल कर सकता है ! एक और लापरवाही देखिए कि इस अपील की सुनवाई 7 अगस्त 2018 को तय की गई थी किंतु उस दिन खुद अनंतराम चौहान सुनवाई हेतु उपलब्ध नहीं थे और उनके कार्यालय से यह बताया गया कि श्री चौहान के उपलब्ध ना होने पर अगली डेट दे रहे हैं।
 इस मामले में इस संवाददाता ने पहले ही अपनी आपत्ति अपील लिखित में प्रस्तुत कर दी थी किंतु इसके बावजूद 8 अगस्त 2018 को प्रथम विभागीय अपीलीय अधिकारी और पुलिस महानिरिक्षक ए आर चौहान ने खुद के उपस्थित न होने का ठीकरा भी इसी संवादाता के सर फोड़ते हुए अपने आदेश में लिख दिया कि अपीलीय अधिकारी तो उपस्थित थे किंतु आप उपस्थित नहीं हो पाए जिस कारण अपील की सुनवाई नहीं की जा सकी और अब अगली तिथि 20 अगस्त को निर्धारित की जाती है। यहां पर यह भी स्पष्ट कर दें कि सूचना के अधिकार अधिनियम में यह स्पष्ट लिखा है कि यदि अपील में अपीलार्थी ना आए तो भी सुनवाई की जाती है अपीलार्थी के ना आने को अपील की सुनवाई स्थगित करने का कारण नहीं बनाया जा सकता।
इस संवाददाता ने यह सूचना सिर्फ इसलिए मांगी थी कि आरोप लगाने वाली महिला सही है अथवा डीजीपी सिद्धू !  किंतु इस प्रकरण में पुलिस मुख्यालय के अधिकारियों की लापरवाही से संदेह गहराता जा रहा है।
 इससे समझा जा सकता है कि अपीलीय अधिकारी इस अपील के निस्तारण के प्रति कितने गंभीर हैं !

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