लिस्ट से हटाया एससी बाहुल्य गांव का नाम। अलग राज्य का अजब तोहफा !!

2011 जनगणना में भारी चूक। उत्तरकाशी के अनुसूचित बाहुल्य गांव पनोथ का नाम सूची से हटाया। राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग की सदस्या स्वराज विद्धवान ने किया गांव का दौरा। शासन प्रसासन को त्रुटि सुधार के दिये निर्देश। आयोग में लंबित 51 हजार मामलों का लिया संज्ञान।

गिरीश गैरोला

अपने गृह जनपद के दौरे पर उत्तरकाशी पहुंची राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की सदस्या dr स्वराज विद्धवान ने जनपद में  वर्षो से अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव पनोथ को  सूची से हटाए जाने पर अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए भूल सुधार करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि ऐसे कई मामले अन्य स्थानों  पर भी हुए होंगे तो उनकी फ़ाइल भी इस बार खुल जाएगी। उन्होंने कहा कि जिस भी स्तर पर ऐसी त्रुटि हुई है वहां उसमें  तत्काल सुधार किया जाय ताकि ऐसे गांवों में सरकारी योजना का एससीपी में लाभ मिल सके।

पूरे देश से आयोग में नामित एक मात्र महिला सदस्य स्वराज ने बताया कि इससे पूर्व अनुसूचित जाति आयोग में केवल राजनीति ही हुई है और अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार और अनाचार हुआ है। उन्होंने पूर्व के आयोगों में बैठे लोगों पर आयोग के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पूर्व में अनुसूचित जाति आयोग कैसे काम कार्य करता होगा !

इस बात से समझा जा सकता है कि  51 हजार मामले आयोग में पेंडिंग पड़े हुए थे। नए आयोग के गठन के साथ ही अकेले उनके द्वारा ही 5 हजार मामले निस्तारित किये गए, जबकि 7 हजार अनावश्यक मामलों को बंद किया गया है। ताकि बेकार का बोझ आयोग पर न पड़े।

बताते चलें कि  वर्ष 1978 में अनुसूचित जाति जनजाति आयोग का गठन गया था और वर्ष 2006 में अनुसूचित जाति आयोग और जनजाति आयोग को अलग अलग कर दिया गया। न्यायिक अधिकारों के साथ तीन वर्ष के लिए चुने जाने वाले अनुसूचित जाति आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसमे एक अध्यक्ष,  एक उपाध्यक्ष के साथ तीन सदस्यों का चुनाव देश भर से किया जाता है, जिसमे एक महिला सदस्य भी चुनी जाती है जो इस बार उत्तरकाशी जनपद की डॉ स्वराज विद्धवान है। स्वराज ने बताया कि उन्हें उत्तराखंडी होने पर गर्व है क्योंकि एक अकेला ऐसा राज्य है जहां हर गांव में अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं और उनमें आपसी भाई चारा भी बना हुआ है। और जातिगत मामलों में उत्पीड़न के मामले सबसे कम है। लिहाजा वे भी अपनी जांच में इस बात का बराबर ध्यान रखती है कि कानून का किसी भी स्तर पर दुरपयोग न हो सके। इसलिए वे भली भांति जांच के बाद ही कोई निर्णय लेती है और शिकायत के झूठ पाए जाने पर झूटी शिकायत करने वाले पर भी कार्यवाही की जाती है।

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