- कफनौल-रूपनौल योजना की सामग्री महीनों से जंगल में लावारिस, सरकारी सिस्टम की कार्यशैली पर उठे सवाल; युवा संगठन ने आंदोलन की दी चेतावनी
नौगांव, उत्तरकाशी। 7 सितंबर। नीरज उत्तराखंडी
‘हर घर जल, हर घर नल’ का सपना दिखाने वाली जल जीवन मिशन योजना नौगांव क्षेत्र के कफनौल गांव में सरकारी कार्यप्रणाली की ऐसी तस्वीर पेश कर रही है, जिस पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
करीब 4.50 करोड़ रुपये की लागत वाली कफनौल-रूपनौल पेयजल योजना की लाइन अभी जमीन पर नहीं बिछी, लेकिन योजना के लिए खरीदे गए लाखों रुपये के पाइप घने जंगलों में जगह-जगह लावारिस पड़े हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वन भूमि से पेयजल लाइन ले जाने की अनुमति ही नहीं मिली थी तो फिर पाइपों की खरीद कैसे हुई और उन्हें जंगल तक पहुंचाने की अनुमति किसने दी?
कफनौल से करीब पांच किलोमीटर दूर रूपनौल तोक तक प्रस्तावित पेयजल योजना करीब आठ किलोमीटर लंबी है। योजना के तहत मोराल्टू से रूपनौल तक पाइप पहुंचा दिए गए, लेकिन वन स्वीकृति के अभाव में लाइन बिछाने का काम आगे नहीं बढ़ सका। नतीजा यह है कि लाखों रुपये की लागत से खरीदी गई सामग्री खुले जंगल में पड़ी धूल फांक रही है।
फाइल शासन में, पाइप जंगल में—आखिर यह कैसी योजना?
जल निगम के अधिशासी अभियंता डीआर बेलवाल के अनुसार योजना की स्वीकृति की फाइल शासन के माध्यम से वन विभाग को भेजी गई है और जल्द वन स्वीकृति मिलने की उम्मीद है। उनका कहना है कि जंगल में पड़े पाइपों की जिम्मेदारी संबंधित ठेकेदार की है।
लेकिन अधिकारी के इस जवाब से कई सवाल और गहरे हो जाते हैं।
- अगर वन स्वीकृति अभी लंबित थी तो पाइपों की खरीद पहले क्यों की गई?
- अगर लाइन बिछाने की अनुमति नहीं थी तो पाइप जंगल तक पहुंचाने की अनुमति किसने दी?
- अगर पाइप ठेकेदार की जिम्मेदारी हैं तो सरकारी योजना की सामग्री की खरीद और भंडारण की विभागीय निगरानी कहां थी?
- और सबसे अहम—यदि वन स्वीकृति मिलने में देरी हुई तो लाखों रुपये की सामग्री को सुरक्षित रखने की व्यवस्था पहले से क्यों नहीं की गई?
- सरकारी धन का इस्तेमाल या जल्दबाजी में की गई खरीद?
मामला सिर्फ जंगल में पड़े पाइपों का नहीं है। सवाल सरकारी धन की कार्ययोजना और उसके इस्तेमाल का भी है। करोड़ों की योजना में पहले आवश्यक विभागीय और वन संबंधी स्वीकृतियां सुनिश्चित की जानी चाहिए थीं या पहले सामग्री खरीदकर जंगल में डाल देनी चाहिए थी?
यदि पाइप लंबे समय तक इसी तरह खुले में पड़े रहते हैं तो उनकी गुणवत्ता, उपयोगिता और सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे में भविष्य में यदि पाइप क्षतिग्रस्त होते हैं अथवा उन्हें बदलने की जरूरत पड़ती है तो इसका आर्थिक भार आखिर किस पर पड़ेगा?
ग्रामीणों को पानी का इंतजार, जंगल में सरकारी योजना की सामग्री
कफनौल और रूपनौल क्षेत्र के ग्रामीण लंबे समय से पेयजल सुविधा की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जिस योजना से घरों तक पानी पहुंचना था, उसकी सामग्री ही जंगल में पड़ी है। ग्रामीणों के लिए यह स्थिति सिर्फ सरकारी देरी नहीं बल्कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर भी सवाल है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पाइप खरीदने में विभाग तेजी दिखा सकता है तो वन स्वीकृति और निर्माण कार्य शुरू कराने में वही तेजी क्यों नहीं दिखाई जा रही?
युवा संगठन ने चेताया—अब आर-पार की लड़ाई
कफनौल युवा संगठन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विभाग और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी शुरू कर दी है। संगठन अध्यक्ष शैलेंद्र चौहान सहित विरेंद्र पंवार, आदेश कफोला, संजय लाल, उत्तम चौहान, अनिल कफोला, शीशपाल लाल, मोहन लाल, युद्धवीर पंवार, कपिल पंवार और नवीन चौहान समेत अन्य युवाओं ने चेतावनी दी है कि यदि योजना को जल्द धरातल पर नहीं उतारा गया और जंगल में पड़े पाइपों के मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो आंदोलन किया जाएगा।
अब जांच के ये सवाल जरूरी
– वन स्वीकृति से पहले पाइप खरीदने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया?
– पाइप खरीदने पर अब तक कितना भुगतान किया जा चुका है?
– पाइपों को जंगल तक पहुंचाने की अनुमति किसने दी?
– सामग्री के सुरक्षित भंडारण की जिम्मेदारी किसकी थी?
– खुले में पड़े पाइपों की गुणवत्ता खराब होने पर नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
– योजना की वन स्वीकृति में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?
– क्या विभाग ने वन स्वीकृति से पहले योजना की पूरी प्रक्रिया और तकनीकी व्यवहार्यता की जांच की थी?
कफनौल-रूपनौल पेयजल योजना अब सिर्फ पानी पहुंचाने की योजना नहीं रही, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की प्लानिंग, निगरानी और जवाबदेही की परीक्षा बन गई है। करोड़ों की योजना फाइलों में आगे बढ़ रही है और लाखों की सामग्री जंगल में पड़ी है।
ऐसे में सरकार और संबंधित विभाग को सिर्फ वन स्वीकृति का इंतजार बताने के बजाय यह भी बताना होगा कि स्वीकृति से पहले सरकारी धन से सामग्री खरीदने की नौबत आखिर आई कैसे?


