आरोग्य मंदिर में 4 महीने से वेतन ‘लापता’, सचिवालय तक सवाल: टेंडर कंपनियां बदलती रहीं, कर्मचारियों का पेट कौन भरेगा? 

रिपोर्ट : कार्तिक उपाध्याय / हल्द्वानी  हल्द्वानी में कर्मचारियों ने खोली व्यवस्था की परतें—श्रम विभाग से कुमाऊँ कमिश्नर तक गुहार का दावा, फिर भी भुगतान नहीं; सरकार से सवाल, योजना की मॉनिटरिंग आखिर किसकी जिम्मेदारी? हल्द्वानी/देहरादून। उत्तराखंड में सरकार जिस शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिर व्यवस्था को आम जनता के दरवाजे तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने की […]

रिपोर्ट : कार्तिक उपाध्याय / हल्द्वानी 

  • हल्द्वानी में कर्मचारियों ने खोली व्यवस्था की परतें—श्रम विभाग से कुमाऊँ कमिश्नर तक गुहार का दावा, फिर भी भुगतान नहीं; सरकार से सवाल, योजना की मॉनिटरिंग आखिर किसकी जिम्मेदारी?

हल्द्वानी/देहरादून। उत्तराखंड में सरकार जिस शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिर व्यवस्था को आम जनता के दरवाजे तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने की महत्वपूर्ण योजना के रूप में पेश करती है, उसी योजना को धरातल पर चलाने वाले कर्मचारियों ने करीब चार महीने से वेतन नहीं मिलने का गंभीर आरोप लगाया है।

हल्द्वानी में कर्मचारियों ने प्रेस वार्ता कर अपनी पीड़ा सार्वजनिक की तो अब मामला केवल स्थानीय स्तर की एक आउटसोर्स कंपनी तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल सीधे देहरादून स्थित स्वास्थ्य शासन और योजना की मॉनिटरिंग व्यवस्था तक पहुंच रहे हैं।

किसान मंच उत्तराखंड ने सरकार और संबंधित विभाग को 48 घंटे में कर्मचारियों का लंबित वेतन दिलाने की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि केवल कंपनी का नाम आगे कर शासन अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।

टेंडर शासन का, योजना सरकार की—फिर कर्मचारी किसके भरोसे?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी योजना में कार्यरत कर्मचारी महीनों तक बिना वेतन कैसे काम करते रहे और जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी होने के बावजूद भुगतान सुनिश्चित क्यों नहीं हुआ?

किसान मंच ने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था में कभी एक कंपनी तो कभी दूसरी कंपनी सामने आती है, लेकिन कर्मचारियों की नौकरी और वेतन की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला तंत्र दिखाई नहीं देता।

मंच का कहना है कि यदि योजना सरकारी है, केंद्रों पर सरकारी योजना का बोर्ड लगा है और जनता वहां सरकार पर भरोसा करके उपचार कराने पहुंचती है तो वहां काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन की निगरानी से शासन स्वयं को अलग नहीं कर सकता।

अब सवाल सचिवालय से—कॉन्ट्रैक्ट में वेतन भुगतान की शर्त क्या है?

इस प्रकरण के बाद स्वास्थ्य शासन के सामने कुछ बेहद सीधे प्रश्न खड़े होते हैं।
जिस एजेंसी को आरोग्य मंदिर संचालन की जिम्मेदारी दी गई, उसके अनुबंध में कर्मचारियों के वेतन की समय सीमा क्या निर्धारित की गई है?
यदि कंपनी समय पर वेतन नहीं देती तो क्या पेनल्टी का प्रावधान है?
क्या किसी अधिकारी को प्रतिमाह यह प्रमाणित करना होता है कि एजेंसी ने अपने कर्मचारियों का वेतन और वैधानिक देयताएं चुका दी हैं?
यदि ऐसी व्यवस्था मौजूद है तो चार महीने का कथित बकाया कैसे हो गया?
और यदि ऐसी मॉनिटरिंग व्यवस्था ही नहीं है तो सवाल नीति निर्माण पर भी खड़ा होता है।

बीना का आरोप—चार महीने से वेतन नहीं, कंपनी देती रही तारीखें

प्रेस वार्ता में कर्मचारी बीना ने आरोप लगाया कि लगभग चार महीने से तनख्वाह का भुगतान नहीं किया गया।
उनके मुताबिक कंपनी की ओर से बार-बार अलग-अलग तारीखें बताई गईं, लेकिन वेतन खाते में नहीं आया।
उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि मामले को मीडिया के सामने न ले जाने का दबाव बनाया गया।
कर्मचारियों का दावा है कि उन्होंने अपनी समस्या श्रम आयुक्त से लेकर कुमाऊँ कमिश्नर तक पहुंचाई। स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर भी गुहार लगाई गई, लेकिन वेतन का समाधान नहीं हुआ।
यदि यह दावा सही है तो सचिवालय के लिए सवाल और गंभीर है—शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचीं तो उन पर कार्रवाई की फाइल कहां तक पहुंची?

मां अस्पताल में बीमार, कर्मचारी के पास वेतन नहीं

फार्मेसी से जुड़े कर्मचारी ललित कुमार ने प्रेस वार्ता में अपनी पारिवारिक स्थिति बताते हुए कहा कि उनकी माताजी का स्वास्थ्य खराब हुआ तो उन्हें गंभीर आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा।
ललित ने कहा कि वह रातभर अस्पताल में परेशान रहे। चार महीने से वेतन नहीं मिलने के कारण परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना मुश्किल हो रहा है।
उनका कहना था—
“हमें कोई विशेष सुविधा नहीं चाहिए, हमारी मेहनत की तनख्वाह ही दिला दी जाए।”
यह बयान उस व्यवस्था पर सवाल है जिसके कर्मचारी स्वयं स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा हैं लेकिन अपने परिवार की बीमारी के समय आर्थिक संकट झेलने का दावा कर रहे हैं।

‘आरोग्य’ का बोर्ड लगा देने से व्यवस्था आरोग्य नहीं हो जाती

किसान मंच ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि योजनाओं का मूल्यांकन केवल कितने आरोग्य मंदिर खोले गए, कितने केंद्र संचालित हैं या कितनी स्वास्थ्य सेवाएं कागज पर उपलब्ध हैं, इससे नहीं होना चाहिए।
मूल्यांकन यह भी होना चाहिए कि वहां काम करने वाले डॉक्टर, नर्सिंग कर्मचारी, फार्मेसी स्टाफ और अन्य कर्मियों को समय पर वेतन मिल रहा है या नहीं।
मंच ने कहा— “जिस कर्मचारी से सरकार जनता को स्वास्थ्य सुविधा देने की उम्मीद कर रही है, वही कर्मचारी चार महीने से अपने वेतन के लिए अधिकारियों के चक्कर काट रहा हो तो इसे सफल व्यवस्था कैसे माना जाए?”

कंपनी के पीछे छिपकर विभाग जिम्मेदारी से नहीं बच सकता—किसान मंच

किसान मंच का कहना है कि आउटसोर्स एजेंसी सरकार ने चुनी है, अनुबंध विभाग ने किया है और काम सरकारी योजना का हो रहा है।
ऐसे में कंपनी द्वारा भुगतान न करने की स्थिति में केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि कर्मचारी कंपनी के अधीन हैं।
सरकार को यह बताना होगा कि कंपनी का चयन किन शर्तों के आधार पर किया गया, उसके भुगतान की निगरानी कौन कर रहा है और यदि कंपनी कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन करती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा।

किसान मंच ने कहा है कि संबंधित विभाग कर्मचारियों की बकाया तनख्वाह 48 घंटे के भीतर जारी करवाए।
साथ ही यह भी जांच हो कि इतने लंबे समय तक भुगतान लंबित रहने के लिए कंपनी के साथ-साथ किस अधिकारी की जवाबदेही बनती है।
मंच ने चेतावनी दी कि यदि फिर कर्मचारियों को केवल अगली तारीख मिली तो आंदोलन का अगला चरण घोषित किया जा सकता है।

सवाल शासन से

1. आरोग्य मंदिरों के संबंधित कर्मचारियों का वेतन कितने माह से बकाया है?
2. एजेंसी को सरकार से भुगतान कब-कब हुआ?
3. एजेंसी को भुगतान होने के बावजूद यदि कर्मचारी को वेतन नहीं मिला तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
4. कंपनी के अनुबंध में समयबद्ध वेतन भुगतान और पेनल्टी का क्या प्रावधान है?
5. कर्मचारियों की शिकायतों पर अब तक किन अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की?
6. क्या शासन या स्वास्थ्य विभाग ने एजेंसी का वेतन, EPF/ESI तथा अन्य देयताओं का ऑडिट कराया है?
7. सबसे महत्वपूर्ण—48 घंटे बाद कर्मचारी के खाते में वेतन होगा या सरकारी फाइल में एक नई तारीख?

सचिवालय को इस सवाल का जवाब देना होगा

मामला केवल कुछ कर्मचारियों के चार महीने के वेतन का नहीं है।
यह उत्तराखंड में आउटसोर्स व्यवस्था के उस मॉडल की परीक्षा भी है जिसमें चेहरा सरकार का, योजना सरकार की, सेवा जनता की—लेकिन कर्मचारी संकट में आए तो जिम्मेदारी कंपनी के खाते में डाल दी जाती है।
यदि कर्मचारियों के आरोप सही पाए जाते हैं तो शासन को केवल बकाया वेतन जारी करवाकर प्रकरण समाप्त नहीं करना चाहिए, बल्कि यह भी तय करना होगा कि भविष्य में किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना में कर्मचारी की तनख्वाह महीनों तक न रुके।
क्योंकि अब सवाल हल्द्वानी से उठ चुका है और जवाब देहरादून के सचिवालय को देना है—
“आरोग्य मंदिर चलाने वाले कर्मचारी चार महीने से वेतन को तरस रहे हैं तो आखिर इस सिस्टम
का ‘आरोग्य’ कौन जांचेगा?”

नोट : Parvatjan संबंधित कंपनी, स्वास्थ्य विभाग एवं शासन का पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।

Also Read This

उपलब्धि : लद्दाख की 6,250 मीटर ऊंची कांग यात्से–II पर लहराया शौका समाज का परचम, पहाड़ की बेटी ने रचा गौरवशाली इतिहास

डीडीहाट। 08 अगस्त 2026,नीरज उत्तराखंडी लद्दाख की 6,250 मीटर ऊंची कांग यात्से–II पर लहराया शौका समाज का परचम, पहाड़ की बेटी ने रचा गौरवशाली...

उपलब्धि : पहाड़ से निकला उड़ने वाली कार का सपना।उत्तराखंड की प्रतिभा ने फिर बढ़ाया प्रदेश का मान

देहरादून।08 अगस्त 2026,नीरज उत्तराखंडी पहाड़ के होनहार इनोवेटर रवि टम्टा की बड़ी उपलब्धि, HAPIDA SKYNeX के प्रोटोटाइप का सफल परीक्षण कम संसाधनों में उड़ने...
Parvatjan Team
Parvatjan Team
Parvatjan Team is dedicated to delivering the latest, accurate, and reliable news from Uttarakhand. We cover local issues, administrative updates, public interest stories, and breaking news in a clear and simple manner.

Related Posts