तकनीकी विश्वविद्यालय की गडबड़ी का प्रधानमंत्री कार्यालय ने लिया संज्ञान

पीएमओ द्वारा उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के संघटक संस्थान THDC-IHET के सम्बन्ध में मिली शिकायत का लिया गया संज्ञान:-

प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा प्रमुख सचिव तकनीकी शिक्षा ओम प्रकाश के विषय में डॉ. अरविन्द कुमार सिंह द्वारा भेजे गए शिकायती सूचना पर संज्ञान लिया गया है।

शिकायत में डॉ. सिंह द्वारा यह सूचित किया गया था कि उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय में व्याप्त अनियमितताओं व भ्रष्टाचार के पीछे प्रमुख सचिव ओम प्रकाश का ही हाथ है।

विश्वविद्यालय एक्ट 2005 को पूरी तरह से प्रमुख सचिव के हस्तक्षेप के कारण कुलपति को निष्प्रभावी कर दिया गया है। बार बार मुख्यमंत्री व राज्यपाल को भेजे शिकायती पत्रों में भी कोई संज्ञान नहीं लिया गया है।

पीएमओ में भेजे गए शिकायती सूचना में यह भी कहा गया है कि राज्यपाल को लिखे एक पत्र (24/05/2018) में महामहिम द्वारा प्रमुख सचिव को जारी आदेश में उचित कार्यवाही  करने व रिपोर्ट को महामहिम कार्यालय में भेजने का आदेश भी दिया गया है परन्तु अब तक रिपोर्ट महामहिम कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। महामहिम को भेजे उक्त पत्र में निदेशक Dr. Geetam Singh Tomar के विरुद्ध उनकी अयोग्यता के बारे में लिखा गया था।

उक्त पत्र में यह दर्शाया गया है कि देश के अंदर किसी भी संस्थान से निदेशक Dr. Tomar को एसोसिएट प्रोफेसर या प्रोफेसर के पद पर चयन ही नहीं किया गया है तथा उक्त पत्र में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूचना दी गयी है कि निदेशक ने AMIE किया है जो कि एक नॉन रेगुलर कोर्स है।

पीएमओ में भेजी गयी सूचना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि विभिन्न स्तरों पर निदेशक के विरुद्ध उनकी अयोग्यता की जांच चल रही है। अतः जब तक जांच न हो जाय उनको सेवा विस्तार न दिया जाय। परन्तु फिर भी इस संघटक संस्थान में विश्वविद्यालय अधिनियम को निष्प्रभावी करके प्रमुख सचिव ने निदेशक को सेवा विस्तार दे दिया है। जबकि वर्तमान में निदेशक के विरुद्ध नई टिहरी कोर्ट में 156 (3) के तहत प्राथमिकी दर्ज़ करने व जांच कराने के लिए मुकदमा दर्ज़ है व उस पर सुनवाई अंतिम चरण में चल रही है।

AICTE नयी दिल्ली में 26 फ़रवरी 2019 को निदेशक के विरुद्ध उनकी अयोग्यता पर अंतिम सुनवाई हो चुकी है तथा जिस पर आदेश आना लंबित है। इन सबके अतिरिक्त निदेशक Dr. Tomar, प्रमुख सचिव, कुलपति व अन्य पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना के कारण उनके विरुद्ध फैसला लंबित है।

परन्तु इन सबके वावजूद निदेशक को सेवा विस्तार दिया गया है। प्रमुख सचिव के द्वारा, जो कि विश्वविद्यालय अधिनियम का खुल्लम खुल्ला उलंघन है। पीएमओ को भेजे गए शिकायती सूचना में यह  भी दर्ज़ है कि प्रमुख सचिव इन्हीं निदेशक के माध्यम से सारे अवैध काम करवाते हैं तथा 15-17 नियमित नियुक्तियों को समाप्त करके किसी भी प्रकार से संस्थान के अध्यापक/कर्मचारियों को नियमित पदों से हटा कर नए सिरे से नियुक्तियां करना चाहते हैं।

प्रमुख सचिव के आदेश से  TEQIP – III के निमित्त राज्य परियोजना सलाहकार को जारी एक आदेश को विश्वविद्यालय के ऊपर थोप दिया गया है।

कुलपति  (इस विश्वविद्यालय में एक वर्ष में चार  कुलपति) स्वयं ही अधिनियम को किनारे रखकर विश्वविद्यालय के सारे काम सरकार के आदेश से करने को अभ्यस्त हो गए हैं। कुलपति  न ही किसी प्राध्यापक/कर्मचारी से मिलते हैं व न ही कोई बैठक ही करते हैं। सरकार के आदेश पर वह सारा काम निदेशकों को सौंप देते हैं यहाँ तक कि वरिष्ठ प्रवक्ताओं के विषय में भी कोई संज्ञान नहीं लेते।

उधर TEQIP – III के लिए प्रमुख सचिव के स्तर पर B O G (Board of Governors) बनाकर जिसका वाईस  चेयरमैन प्रमुख सचिव स्वयं हैं, ने इस B O G के माध्यम से पूरे संघटक संस्थानों को अपने अधीन कर लिया है व कुलपति को अधिकार विहीन कर दिया है।

इन परिस्थियों में अध्यापकों की नियमित नौकरी केवल प्रमुख सचिव के दखल के कारण जा सकती है। पीएमओ में भेजे गए शिकायती सूचना में यह भी दिया गया है कि किस तरह से विश्वविद्यालय द्वारा संचालित इस स्ववित्त पोषित संस्थान में उत्तराखंड सरकार ने पदों को सृजित कर भरने का निर्णय लिया है। जबकि उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट निर्णय के अवलोकन में फैकल्टी एसोसिएशन THDC-IHET ने अपने प्रसेन्टेशन्स में माननीय राज्यपाल व माननीय मुख्यमंत्री जी को इस बात से अवगत करा दिया है कि वह निर्णय उत्तराखंड उच्च न्यायालय के पूर्ण पीठ के 1 December 2015 (WPSB 193/2014) के फैसले के विरुद्ध है जिस फैसले के विरुद्ध उत्तराखंड सरकार व अन्य छः बार विशेष अनुमति याचिका माननीय सर्वोच्च न्यायलय में दाखिल कर हार चुके हैं।तकनीकी विश्वविद्यालय की सेमेस्टर परीक्षाओं के समय ये निदेशक परीक्षा केंद्रों पर बिलकुल न के बराबर रहते हैं जबकि उनका परीक्षा केंद्रों पर केंद्र अधीक्षक के नाते रहना अनिवार्य है। बार बार परीक्षा नियंत्रक को शिकायत भेजने पर भी निवर्तमान परीक्षा नियंत्रक द्वारा कोई सुधार न करना व निदेशक तथा केंद्र अधीक्षक के साथ खड़ा हो जाने से ऐसी समस्या का उठना स्वाभाविक है।

उपर्युक्त सभी बातों को ध्यान में रखते हुए व विगत दो-कहा जा सकता है कि जब उत्तराखंड सरकार के पास IIT  के PROFESSORS हैं तो किसी भी परिस्थिति में ऐसे विवादास्पद निदेशकों को जिनकी योग्यता ही जांच के दायरे में है, जांच का जिम्मा कैसे दिया जा सकता है व इस प्रकार के जांच का क्या अर्थ है !

अतः अब भी समय है कि तकनीकी शिक्षा मंत्री (वर्तमान में मुख्यमंत्री) तथा राज्यपाल संज्ञान लेते हुए विश्वविद्यालय अधिनियम के माध्यम से विश्वविद्यालय को सुचारु रूप से चलने का आदेश दें तथा IIT  के PROFESSORS की एक टीम बनाकर वर्तमान में सभी संघटक संस्थानों में कार्यरत निदेशकों की योग्यता की जांच कराएं। पीएमओ द्वारा लिए गये संज्ञान से विश्वविद्यालय को सुचारु रूप से चलने में मदद मिलेगी।

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