बड़ी खबर : विधानसभा अध्यक्ष रितु खंडूरी ने की बाहरी लोगों की बैकडोर भर्तियां। मच गया बवाल

उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष रितु खंडूरी द्वारा गोविंद सिंह कुंजवाल और प्रेमचंद्र अग्रवाल के कार्यकाल में नियुक्त किए गए लगभग 230 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन खुद रितु खंडूरी ने उत्तराखंड से बाहर के लोगों को विधानसभा में भर्ती दे दी। जिसके बाद उत्तराखंड में बवाल मचना तो तय था ही।

सोशल मीडिया पर गोविंद सिंह कुंजवाल और प्रेमचंद अग्रवाल के कार्यकाल की नियुक्तियों की बर्खास्तगी के बाद से ही से ही उत्तराखंड की जनता और मीडिया द्वारा लगातार रितु खंडूरी से यह सवाल पूछा जा रहा है कि जिस जांच कमेटी ने बैक डोर भर्तियों की जांच की उसने सभी बैक डोर भर्तियों को अवैध माना लेकिन उन्होंने मात्र गोविंद सिंह कुंजवाल और प्रेमचंद अग्रवाल के कार्यकाल की भर्तियों को ही क्यों निरस्त किया। जब सभी भर्तियां अवैध हैं तो प्रकाश पंत,यशपाल आर्य और हरबंस कपूर के कार्यकाल की भर्तियों पर क्यों कोई कार्यवाही नहीं की गई।

ऊपर से सोशल मीडिया पर जो बवाल मचा हुआ है उसका एक और बड़ा कारण उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद रितु खंडूरी द्वारा को-टर्मिनस के आधार पर की गई भर्तियां भी है।

विधानसभा अध्यक्ष रितु खंडूरी की सोशल मीडिया पर जमकर किरकिरी हो रही है की जब सब भर्तियां अवैध हैं तो रितु खंडूरी द्वारा की गई भर्तियां वेध कैसे हुई।

साथ ही यह सवाल बड़ा और भी हो गया जब पता लगा कि जिन लोगों को उत्तराखंड विधानसभा में तैनात किया है वह सब उत्तराखंड से बाहर के लोग हैं।

सोशल मीडिया में जो लिस्ट वायरल हो रही हैं उसके अनुसार, उत्तराखंड विधानसभा में जो बैक डोर भर्तियां की गई हैं उसने सबसे पहला नाम विशेष कार्य अधिकारी अशोक शाह पुत्र स्वर्गीय डीएल शाह हैं। अशोक साहब दिल्ली के निवासी हैं और इनकी लेवल 10 की तनख्वाह है जो लगभग प्रतिमाह 100000 होती है।

दूसरे नंबर पर सहायक जनसंपर्क अधिकारी आभास सिंह पुत्र भूपेंद्र सिंह निवासी फ्लैट नंबर 1130 ब्लॉक ए गौर सिटी 1 नोएडा एक्सटेंशन इनके लिए लेवल 7 की वेतन जो कि लगभग ₹60000 है ।

तीसरे नंबर पर सहायक सूचना अधिकारी उत्कर्ष रमन पुत्र मूलनिवासी पटना बिहार के है इनके लिए भी लेवल 7 की तनख्वाह लगभग ₹60000 नियत की गई है।

चौथे नंबर पर सलाहकार के रूप में ललित डागर को तैनाती दी गई है जो कैलाश नगर नई दिल्ली के रहने वाले हैं।

अब देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि क्या मात्र लीपापोती करके इन भर्तियों को बचा लिया जाएगा या उत्तराखंड विधानसभा में शुरू से हुई सभी भर्तियों को निरस्त किया जाएगा।

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