फूलदेई पर फिदा हुए आनंद महिंद्रा, बोले– दुनिया तक पहुंचे उत्तराखंड की ये खूबसूरत परंपरा

देहरादून, 17 मार्च 2026:

Anand Mahindra ने उत्तराखंड के पारंपरिक लोक पर्व Phool Dei (फूलदेई) की खुलकर सराहना करते हुए इसे प्रकृति और सकारात्मकता का अनोखा उत्सव बताया है। महिंद्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में इस पर्व को “Monday Motivation” करार देते हुए इसकी भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई की प्रशंसा की।

 

महिंद्रा ने लिखा कि हाल ही तक वे फूलदेई के बारे में नहीं जानते थे, लेकिन इस पर्व की परंपरा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के गांवों में बच्चे पहाड़ों से ताजे फूल लाकर घर-घर के दरवाजों पर रखते हैं और समृद्धि की कामना करते हैं—“फूल देई, छम्मा देई, देनी द्वार, भर भकार…”। बदले में बच्चों को मिठाइयां मिलती हैं।

 

उन्होंने इस परंपरा की तुलना Halloween से करते हुए कहा कि जहां हैलोवीन में बच्चे “ट्रिक या ट्रीट” कहते हैं, वहीं फूलदेई में बच्चे पहले देने की भावना से फूल अर्पित करते हैं, जो इसे और भी खूबसूरत बनाता है।

 

महिंद्रा ने यह भी कहा कि जैसे Holi ने देश और दुनिया में अपनी पहचान बनाई है, उसी तरह फूलदेई को भी व्यापक स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए। उन्होंने उत्तराखंड के बच्चों को अपनी प्रेरणा बताया और इस परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान देने की इच्छा जताई।

 

महिंद्रा की इस पोस्ट पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने प्रतिक्रिया देते हुए उनका आभार व्यक्त किया। सीएम धामी ने कहा कि महिंद्रा ने देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं और प्रकृति से जुड़े इस पर्व की भावना को बेहद सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है।

 

इसके जवाब में महिंद्रा ने भी मुख्यमंत्री को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्हें उत्तराखंड और फूलदेई के लिए कुछ करने का अवसर मिलना सौभाग्य की बात होगी।

 

फूलदेई उत्तराखंड का एक प्रमुख लोक पर्व है, जो चैत्र संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है। इस दिन बच्चे, खासकर बालिकाएं, सुबह-सुबह फूल इकट्ठा कर घरों के द्वार पर सजाती हैं और खुशहाली की कामना करती हैं। यह पर्व प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।

 

महिंद्रा की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर फूलदेई को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सराहना से उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने की संभावना और मजबूत हो जाती है।

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