गजब: सीएम त्रिवेन्द्र ने समर्थकों को बांटी रेवड़ियां, अब विभाग कब बाटेंगे? आधे कैबिनेट के पास 30 विभाग, सीएम के पास 42

सीएम त्रिवेन्द्र ने समर्थकों को बांटी रेवड़ियां, अब विभाग कब बाटेंगे? आधे कैबिनेट के पास 30 विभाग, सीएम के पास 42

 

– आखिर इतना बोझ कैसे सह लेते हो सीएम साहब

रिपोर्ट- गुणानंद जखमोला
लोकतंत्र में एक बडी अच्छी परम्परा है, चार साल तक सीएम-पीएम न तो जनता की सुनता है और न ही समर्थकों की। उसे पता होता है कि, जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है और उसकी निष्ठा चुटकी भर। सो, चार साल खूब मनमानी की जाती है और पांचवें साल में कुछ काम जनता का और कुछ काम समर्थकों का। समर्थकों के आगे पदों का चारा फेंक दिया जाता है, कि चल कुछ तू भी चुग ले। जनता को बहलाया जाता है कि सुन री नामुराद, घूरे के भी दिन फिरते हैं, तेरे भी फिर रहे हैं, तू भी बड़ा विकास, विकास करती है, गरीबी का रोना रोती है, चल तू भी कर ले एहसास कि विकास क्या होता है?

सीएम त्रिवेंद्र भी लोकतंत्र की इसी परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। सो, चुल्लू भर पानी में सी-प्लेन उतारने, पैरा-ग्लाइडिंग संस्थान खोलने और कई लोक-लुभावनी घोषणाएं कर रहे हैं। यूं जता रहे हैं कि बस, पिछले 20 साल का दो फीट के बौने विकास को खींचकर 6 फीट लंबा कर दिया गया हो। केंद्र सरकार द्वारा निजी हाथों को सौंपी गई तेजस ट्रेन घाटा होने से भले ही रद्द की गयी हो, लेकिन उत्तराखंड सरकार बुलेट ट्रेन की रफ्तार से विकास करने में जुटी है। अब ले-दे कर कुछ समर्थक कम अपनी उपेक्षा से गुस्साए नेता के आगे दाना डाल दिया गया है। समर्थक इतरा रहे हैं और पिछले चार साल का दुख भूल गये कि उनको किसी सरकारी क्लर्क ने भी तवज्जो नहीं दी।

खैर, सर्दियों का मौसम है और रेवडियां बंट रही हैं तो क्या बुरा है? मुझे कोई ऐतराज नहीं है। मेरा क्या जा रहा है, बस, सवाल यह है कि, त्रिवेंद्र सर्दियों में दो-तीन स्वेटर और फतिकी के बोझ के साथ 42 विभागों का बोझ कैसे सह रहे हैं? आखिर कैसे झेल लेते हो इतना बोझ? इस बोझ को भी कुछ कम कम कर देते? क्या विधायकों को दोबारा टिकट नहीं देगी भाजपा। ठीक भी है, निकम्मे विधायक हैं। यदि मोदी लहर नहीं होती, तो ग्राम प्रधान या पार्षद बनने लायक भी नहीं हैं भाजपा के अधिकांश विधायक।

इतना ही बहुत है कि उनसे विधायकी का इस्तीफा नहीं लिया गया। यदि लिया जाता तो त्रिवेंद्र का बोझ कुछ कम हो जाता तो वो एक साल तक खूब घोषणा रूपी विकास करते। इतनी घोषणाएं कि साढ़े तीन साल में सात लाख लोगों को रोजगार दिया और पांच साल पूरे होने पर 1 करोड़ 20 लाख लोगों को रोजगार मिल सके, इसमें दस-पांच लाख बिहारी और नेपाली लोग भी शामिल हों।

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