रिपोर्ट – कार्तिक उपाध्याय
उत्तराखंड के स्वास्थ्य विभाग में स्थानांतरण व्यवस्था, सरकारी अस्पतालों की जवाबदेही और स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला एक मामला उत्तरकाशी जनपद से सामने आया है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) चिन्यालीसौड़ में वर्षों तक तैनात रहे प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. विनोद कुकरेती को अंततः मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) उत्तरकाशी ने एकतरफा (एकपक्षीय) कार्यमुक्त कर दिया। यह कार्रवाई तब हुई, जब शासन स्तर से जारी स्थानांतरण आदेश के बावजूद उन्होंने निर्धारित समय सीमा के भीतर नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया।
मामले की गंभीरता केवल स्थानांतरण आदेश तक सीमित नहीं है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में यह उल्लेख किया गया है कि उपलब्ध ओपीडी रजिस्टर के अनुसार संबंधित अवधि में प्रभारी चिकित्सा अधिकारी द्वारा एक भी मरीज नहीं देखा गया। यह तथ्य सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली, निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर बहस छिड़ गई है।
शासन के चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा अनुभाग-1 द्वारा 29 जून 2026 को वार्षिक स्थानांतरण आदेश जारी किया गया था। आदेश के अनुसार डॉ. विनोद कुकरेती का स्थानांतरण सीएचसी चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी) से सीएचसी रायपुर (देहरादून) किया गया। इसके बाद महानिदेशालय चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण ने भी स्थानांतरण आदेश के अनुपालन के निर्देश जारी किए।
सीएमओ उत्तरकाशी कार्यालय की ओर से जारी पत्र में उल्लेख है कि शासन के निर्देशों के अनुसार स्थानांतरित चिकित्सकों को निर्धारित समय सीमा के भीतर नवीन तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण करना था। इसके लिए कार्यालय स्तर से भी निर्देश जारी किए गए, लेकिन डॉ. कुकरेती द्वारा नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण नहीं किया गया। अंततः 24 जुलाई 2026 को सीएमओ उत्तरकाशी ने आदेश जारी कर उन्हें एकतरफा कार्यमुक्त करते हुए उनकी सेवा अभिलेख नई तैनाती वाले कार्यालय को भेजने के निर्देश दिए।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक आरटीआई जवाब ने मामले को और अधिक चर्चाओं में ला दिया। आरटीआई के तहत उपलब्ध कराए गए उत्तर में सीएमओ कार्यालय ने उपलब्ध अभिलेखों का हवाला देते हुए लिखा कि ओपीडी रजिस्टर के अनुसार संबंधित अवधि में प्रभारी चिकित्सा अधिकारी द्वारा एक भी मरीज नहीं देखा गया।
यदि यह रिकॉर्ड सही है, तो यह सवाल खड़ा होता है कि एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में वर्षों तक तैनात अधिकारी की कार्यप्रणाली की नियमित समीक्षा क्यों नहीं हुई और विभागीय निगरानी व्यवस्था इस स्थिति को समय रहते क्यों नहीं पकड़ सकी।
स्थानीय स्तर पर भी सीएचसी चिन्यालीसौड़ की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर असंतोष की चर्चाएं होती रही हैं। स्थानीय लोगों और विभागीय सूत्रों के अनुसार अस्पताल में चिकित्सकीय सेवाओं, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के प्रभावी संचालन को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित चिकित्साधिकारी का पक्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उत्तराखंड सरकार लगातार दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का दावा करती रही है। ऐसे में यदि किसी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आरटीआई अभिलेखों के अनुसार वर्षों तक ओपीडी में एक भी मरीज नहीं देखने का उल्लेख मिलता है, तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं रह जाता बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की निगरानी और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।
अब इस पूरे प्रकरण के बाद कई अहम सवाल सामने हैं।
- यदि स्थानांतरण आदेश का समय पर पालन नहीं हुआ तो इसकी जिम्मेदारी किसकी थी?
- यदि आरटीआई में दर्ज ओपीडी रिकॉर्ड सही हैं तो इतने लंबे समय तक विभागीय निरीक्षण और समीक्षा में यह स्थिति सामने क्यों नहीं आई?
- क्या संबंधित प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच होगी?
- और क्या भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग कोई ठोस व्यवस्था विकसित करेगा?
फिलहाल सीएमओ उत्तरकाशी की ओर से एकतरफा कार्यमुक्त किए जाने के आदेश के बाद यह मामला प्रशासनिक स्तर पर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। वहीं आरटीआई से सामने आए तथ्यों ने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमित निगरानी की आवश्यकता को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।
(समाचार उपलब्ध सरकारी आदेशों, आरटीआई से प्राप्त अभिलेखों और विभागीय दस्तावेजों पर आधारित है। यदि संबंधित चिकित्साधिकारी या स्वास्थ्य विभाग का विस्तृत पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)







