- 1,243 गिरफ्तारियां, केवल 104 आरोपियों को सजा; आयकर विभाग के 2,127 अभियोजन मामलों में भी 233 मामलों में ही हुई दोषसिद्धि
देहरादून/नई दिल्ली, अगस्त। नीरज उत्तराखंडी
देश की प्रमुख आर्थिक अपराध जांच एजेंसियों—प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आयकर विभाग—की कार्रवाई और उसकी प्रभावशीलता को लेकर संसद में पेश किए गए ताजा आंकड़ों ने नई बहस छेड़ दी है। वित्त मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2021-22 से 2025-26) के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत 4,622 मामले दर्ज किए और 1,243 लोगों को गिरफ्तार किया। इसके बावजूद इस अवधि में केवल 43 मामलों में दोषसिद्धि हो सकी, जबकि 104 आरोपियों को सजा मिली।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, जांच की गुणवत्ता तथा न्यायिक प्रक्रिया की गति पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में छापेमारी और गिरफ्तारियों की तुलना में दोषसिद्धि का आंकड़ा बेहद कम दिखाई देता है, जिससे जांच की प्रभावशीलता पर चर्चा स्वाभाविक है।
आयकर विभाग के आंकड़े भी चिंताजनक
आयकर विभाग के अभियोजन मामलों की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 2,127 अभियोजन मामले दर्ज किए गए। इनमें से 233 मामलों में दोषसिद्धि हुई, जबकि 854 मामलों में अदालतों ने आरोपियों को बरी कर दिया। शेष बड़ी संख्या में मामले अभी भी विभिन्न अदालतों में लंबित हैं।
सरकार ने दी यह सफाई
वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इन आंकड़ों की तुलना सीधे-सीधे नहीं की जा सकती, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया लंबी होती है। जिन मामलों में सजा या बरी होने का फैसला आया है, वे जरूरी नहीं कि उसी वर्ष दर्ज किए गए हों। कई मामलों की सुनवाई वर्षों तक चलती है और बड़ी संख्या में प्रकरण अभी न्यायालयों में विचाराधीन हैं।
उठ रहे हैं कई अहम सवाल
इन आंकड़ों के बाद कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आए हैं—
- क्या जांच एजेंसियां पर्याप्त साक्ष्य जुटाने में सफल हो रही हैं?
- क्या लंबी न्यायिक प्रक्रिया दोषसिद्धि की कम दर का प्रमुख कारण है?
- क्या आर्थिक अपराधों की जांच और अभियोजन प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है?
- क्या अदालतों में लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए विशेष व्यवस्था की जरूरत है?
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दर्ज मामलों या गिरफ्तारियों की संख्या किसी एजेंसी की सफलता का पैमाना नहीं हो सकती। किसी भी जांच एजेंसी की वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन दोषसिद्धि की दर, जांच की गुणवत्ता और अदालत में साक्ष्यों की मजबूती के आधार पर किया जाता है।
वहीं सरकार का तर्क है कि आर्थिक अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की प्रकृति जटिल होती है, इसलिए इनकी जांच और सुनवाई में अधिक समय लगता है।
संसद में प्रस्तुत इन आंकड़ों के बाद विपक्ष ने जांच एजेंसियों के प्रदर्शन और उनके उपयोग को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि एजेंसियां कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर रही हैं और लंबित मामलों के निस्तारण के बाद दोषसिद्धि के आंकड़ों में वृद्धि हो सकती है।
फिलहाल, पांच वर्षों में हजारों मामलों और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियों के मुकाबले बेहद सीमित दोषसिद्धि के आंकड़ों ने देश में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, न्यायिक प्रक्रिया की गति और आर्थिक अपराधों से निपटने की मौजूदा व्यवस्था पर व्यापक बहस को जन्म दे दिया है।







