जेनी ने कहा कि उनका बेटा पिछले 23 वर्षों से पिता की पहचान के बिना जीवन बिता रहा है। अब वह चाहती हैं कि उनके बेटे को उसकी पहचान मिले। उनके नए बयानों के बाद प्रदेश की राजनीति में पुराने जेनी प्रकरण को लेकर फिर बहस तेज होने के आसार हैं।
‘मेरा बेटा 23 साल से बिना पिता के रह रहा, उसे नाम चाहिए’
पत्रकार वार्ता के दौरान जेनी ने अपने बेटे की पहचान का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि उनका बेटा 23 साल से पिता के नाम के बिना रह रहा है और अब उसे उसका अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने बेटे का DNA परीक्षण कराने की मांग भी की।
जेनी ने आरोप लगाया कि उनके साथ कथित शोषण के बाद उन्हें मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें मानसिक अस्पताल में रखा गया था और उस दौरान उनकी मानसिक स्थिति बेहद खराब थी। उनके मुताबिक, अस्पताल में उनसे जबरन हस्ताक्षर कराए गए।
उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई के अधिकारी उनसे मिलने केवल एक बार अस्पताल आए थे। जेनी ने सवाल उठाया कि उस समय उनकी मानसिक स्थिति और परिस्थितियों को समझने का प्रयास क्यों नहीं किया गया।
2002 में देहरादून पहुंची थीं जेनी, 2003 में दिया था बेटे को जन्म
जेनी प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2002 के आखिरी महीनों में हुई थी। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, असम की रहने वाली इंदिरा देवी उर्फ जेनी दिसंबर 2002 में देहरादून पहुंची थीं। उस समय उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और डॉ. हरक सिंह रावत राजस्व मंत्री थे।
जेनी ने आरोप लगाया था कि नौकरी दिलाने का भरोसा देकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में उन्हें सरकारी आवास में रखा गया। 15 जून 2003 को उन्होंने देहरादून के एक सरकारी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने हरक सिंह रावत को अपने बच्चे का पिता बताते हुए यौन शोषण के आरोप लगाए।
18 जून 2003 को यह मामला विधानसभा में भी उठा था। विपक्ष ने सदन में सरकार को घेरा और निष्पक्ष जांच की मांग की थी। विवाद के बीच हरक सिंह रावत ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया था।
सीबीआई ने दर्ज किया था मुकदमा, DNA रिपोर्ट में नहीं हुआ था मिलान
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने सीबीआई जांच की संस्तुति की थी। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सीबीआई ने जांच के दौरान जेनी और अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए थे। 25 जुलाई 2003 को जेनी के बयान के आधार पर हरक सिंह रावत के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
जांच के दौरान बच्चे और हरक सिंह रावत के DNA नमूनों का परीक्षण भी कराया गया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, DNA जांच में दोनों के नमूनों का मिलान नहीं हुआ था। इसके बाद बच्चे का जैविक पिता होने के आरोप के संबंध में हरक सिंह रावत को राहत मिलने की बात सामने आई थी। हरक सिंह रावत ने भी DNA रिपोर्ट को अपनी बेगुनाही का आधार बताया था।
अक्टूबर-नवंबर 2026 में फिर गरमाया जेनी प्रकरण
अक्टूबर 2026 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हल्द्वानी में पुराने जेनी प्रकरण का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा था। इसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य महेंद्र भट्ट ने भी बच्चे के पिता की पहचान को लेकर सवाल उठाए थे।
इस पर हरक सिंह रावत ने पलटवार करते हुए कहा था कि उनका DNA परीक्षण पहले ही हो चुका है और जांच में वह निर्दोष साबित हुए हैं। उन्होंने महेंद्र भट्ट को भी DNA परीक्षण कराने की चुनौती दी थी। हरक सिंह रावत ने सार्वजनिक रूप से आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते हुए अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया था।
इसके बाद जेनी के नाम से सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने नेताओं से उनके नाम पर राजनीति बंद करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि इतने वर्षों में किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वर्ष 2003 में उनके साथ वास्तव में क्या हुआ था।
अब पुराने दस्तावेज और नए आरोप होंगे अहम
7 नवंबर को उत्तरांचल प्रेस क्लब में हुई पत्रकार वार्ता के बाद जेनी प्रकरण में कई सवाल फिर खड़े हो गए हैं। जेनी ने मानसिक अस्पताल में रखे जाने, जबरन हस्ताक्षर कराने और सीबीआई अधिकारियों के उनसे सीमित संपर्क को लेकर आरोप लगाए हैं।
अब इन दावों की पुष्टि के लिए अस्पताल के रिकॉर्ड, उस समय की जांच से जुड़े दस्तावेज और संबंधित अधिकारियों के अभिलेख महत्वपूर्ण होंगे। वहीं, बेटे के DNA परीक्षण की मांग पर भी आगे की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी, यह देखना अहम रहेगा।
फिलहाल जेनी के नए आरोपों पर हरक सिंह रावत का ताजा पक्ष सामने आना बाकी है। 23 साल पुराने इस मामले में नए दावों, पुराने जांच रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाब के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।






