मोरी उत्तरकाशी 28 फरवरी 2026
नीरज उत्तराखंडी
प्रदेश सरकार भले ही दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। उत्तरकाशी जनपद के मोरी विकासखंड के सुदूरवर्ती लिवाड़ी गांव में स्थित राजकीय एलोपैथिक अस्पताल वर्षों से बंद पड़ा है। अस्पताल पर ताला लटका होने के कारण ग्रामीणों को सामान्य बीमारियों—बुखार, खांसी, पेटदर्द—की दवा के लिए भी करीब 70 किलोमीटर दूर मोरी तक का सफर तय करना पड़ रहा है।
पांच गांवों की उम्मीदों पर ताला
लिवाड़ी गांव और आसपास के पांच गांवों की स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए वर्षों पूर्व एक निजी भवन में राजकीय एलोपैथिक अस्पताल खोला गया था। स्थानीय ग्रामीणों—दिनेश रावत, जयमोहन रावत और सुरेंद्र रावत—का कहना है कि अस्पताल खुलने से क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं मिलने की उम्मीद जगी थी। लेकिन शासन-प्रशासन की अनदेखी के चलते अस्पताल का संचालन नियमित नहीं हो पाया और अब स्थिति यह है कि भवन में ताला लटका है तथा दवाइयों की आपूर्ति भी बंद हो चुकी है।
डॉक्टरों की तैनाती भी नहीं टिक पाई
प्रदेश गठन के बाद यहां दो बार डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती की गई, लेकिन दूरस्थ क्षेत्र की चुनौतियों के कारण वे दो-तीन दिन से अधिक नहीं रुक सके। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग ने स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर पहल नहीं की।
इस संबंध में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोरी के चिकित्साधिकारी डॉ. नितेश रावत का कहना है कि लिवाड़ी में तैनात डॉक्टर पीजी कोर्स के लिए चले गए हैं, जिसके कारण अस्पताल फिलहाल खाली है। हालांकि, उन्होंने शीघ्र ही व्यवस्था बहाल करने का आश्वासन दिया।
आपात स्थिति में बढ़ता खतरा
ग्रामीणों का कहना है कि सामान्य बीमारी के लिए भी 70 किमी की दूरी तय करना आर्थिक और शारीरिक दोनों दृष्टि से कठिन है। बरसात या बर्फबारी के दौरान मार्ग बाधित होने पर स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। आपातकालीन हालात में समय पर इलाज न मिल पाने से जान का खतरा बना रहता है।
ग्रामीणों की मांग
स्थानीय लोगों ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि—
अस्पताल में स्थायी डॉक्टर और फार्मेसिस्ट की तैनाती की जाए।
नियमित दवा आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत चिकित्सकों के लिए विशेष प्रोत्साहन नीति लागू की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं निकाला गया तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली एक बार फिर सरकार के दावों पर सवाल खड़े कर रही है। अब देखना यह होगा कि लिवाड़ी और आसपास के गांवों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा कब तक मिल पाती
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