मिसाल: त्यूनी के मुकेश जोशी ने एप्पल मिशन से बदली अपनी किस्मत। बन रहे युवाओं के प्रेरणास्त्रोत

त्यूनी (25 अप्रैल 2025), संवाददाता: नीरज उत्तराखंडी 
जौनसार-बावर के जनजातीय क्षेत्र में एक युवा ने पारंपरिक बागवानी को आधुनिक स्वरूप देकर न केवल खुद के लिए रोजगार का जरिया बनाया, बल्कि क्षेत्र के युवाओं को भी स्वरोजगार की ओर प्रेरित किया है। मुन्धौल गांव निवासी मुकेश जोशी ने ‘एप्पल मिशन योजना’ के तहत सघन सेब उत्पादन शुरू कर स्वरोजगार की अलख जगाई है।

सामान्य रूप से एक संभ्रांत संयुक्त परिवार में जन्मे मुकेश जोशी के पिता दिनेश चंद्र जोशी जल संस्थान में कार्यरत हैं और माता रमोला जोशी एक कुशल गृहिणी हैं। मुकेश ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छोड़कर हिमाचल प्रदेश के कोटखाई निवासी सेब उत्पादक अवनीश चौहान से प्रेरणा लेकर बागवानी को करियर का माध्यम बनाया।

मुकेश ने अपने पुश्तैनी बागवानी व्यवसाय को आधुनिक तकनीक के साथ अपनाया। वर्तमान में वे 6100-6200 फीट (करीब 1850 मीटर) की ऊंचाई पर एक हेक्टेयर क्षेत्र में ‘एम-9 रूट स्टॉक’ प्रजाति के 1000 से अधिक पौधे लगा चुके हैं। इनमें ‘गाला बिग बक्स’, ‘किंग रॉट’, ‘डार्क बैरोन गाला’, ‘डेविल गाला’, ‘गाला MGCP’, ‘टी रेक्स गाला’ और ‘शिनिगा रेड गाला’ जैसी उन्नत किस्में शामिल हैं।

मुकेश बताते हैं कि वर्ष 2024 में उन्होंने शुरुआत के तौर पर प्रत्येक पौधे से 3-4 फल लिए और करीब 10 हॉफ बॉक्स सेब उत्पादन किया। बाजार में इनका भाव इतना मिला कि 10 किलोग्राम सेब का दाम 2800 रुपये तक पहुंच गया यानी एक 25 किलो का बॉक्स लगभग 7000 रुपये में बिका।

मुकेश का सपना अगले 2-3 वर्षों में 5000 अति सघन पौधे लगाने और अन्य बेरोजगार युवाओं को भी इस काम से जोड़कर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने का है। उनका मानना है कि आज के युवा 10-20 हजार रुपये की नौकरी के लिए शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं, जबकि गांव में रहकर आधुनिक बागवानी से वे इससे कहीं अधिक आमदनी कर सकते हैं।

सेहत और समृद्धि दोनों देती है बागवानी
मुकेश का मानना है कि बागवानी सिर्फ रोजगार नहीं, एक स्वस्थ जीवनशैली का माध्यम भी है। वे बताते हैं कि रोज़ अपने खेतों में जाकर पौधों की देखभाल करना न सिर्फ फसलों की गुणवत्ता को बेहतर करता है, बल्कि शरीर और मन को भी नई ऊर्जा और ताजगी प्रदान करता है।

मुकेश पिछले 6 वर्षों से स्वयं बागवानी कर रहे हैं और आज वे इस क्षेत्र में सफलतापूर्वक एक मिसाल बन चुके हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि सही सोच, तकनीक और मेहनत के बल पर पहाड़ों में भी खुशहाली लाई जा सकती है।

प्रशासन और कृषि विभाग से है सहयोग की उम्मीद
मुकेश जैसे युवाओं की सफलता यह दर्शाती है कि यदि सरकारी योजनाओं का सही दिशा में उपयोग हो, तो पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन को रोका जा सकता है और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए जा सकते हैं। जरूरत है तो बस सकारात्मक सोच, दृढ़ निश्चय और थोड़ी हिम्मत की।

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