अब तो बिजली की समस्या से निजात दिला दो ‘सरकार’!

डा. रमेश बिष्ट/बागेश्वर

प्रदेश में बिजली आपूर्ति में सुधार को लेकर बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं। शहरों व कागजों में डबल इंजन सरकार के स्तर पर काफी सक्रियता दिखाने का प्रयास  किया जा रहा है। प्रदेश सरकार द्वारा जहां एक ओर ‘सौभाग्य’ योजना को एक मुहिम के तहत पेश किया जा रहा है, योजना के अनुसार वंचित परिवारों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार से भारी भरकम बजट देने की बात की जा रही है, लेकिन यह सब शहरों व औद्योगिक  क्षेत्रों या कागजों तक ही सिमटता नजर आ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों मे कार्यदायी विभाग की कार्य प्रणाली को देखकर लगता है कि वहां तक इस योजना का पहुंचना तो दूर, जो है वही दुरस्त हो जाय तो कुछ तो राहत मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में हकीकत सारे दावों के विपरीत है।

सुदूर ग्रामीण दुर्गम पहाडी क्षेत्रों में बिजली नेटवर्क के हाल खराब हैं जहां दिन मे बिजली हो न हो ज्यादा फर्क नही पड़ता किन्तु रात्रि में उजाला होना अनिवार्य हो गया है, क्योकि रात में हिंसक जंगली जानवरों के आतंक ने लोगों का जीना मुश्किल कर रखा है।

बिजली की समस्या का आलम यह है कि ब्रेकडाउन को छोड़ भी दिया जाय, तो भी विभाग की लापरवाही व खामियों के चलते ग्रामीणों को आए दिन बिजली बन्द होने से अन्धेरे में हिंसक जानवरों के भय के साथ रात गुजारनी पड़ रही है।

इसकी बानगी बागेश्वर जिले के गोमती घाटी मे ग्राम सभा मैगडी स्टेट एवं उसके आस-पास के गावों में बखूबी देखी जा सकती है। यहां के कई तोक, सिमसाल, बिरखाल, जामणगैर, सेलाबगढ, सेलीगाड आदि जगंल के पास बसे हैं, जहां सैकड़ों परिवार रहते हैं। पर्वतजन ने यहां की बिजली समस्या पर एक लेख (7 जून, लकड़ी के  लटठों के सहारे उर्जा प्रदेश ) प्रमुखता से छापा था। साथ मे चार फोटो भी प्रकाशित किए थे।

विभाग की कार्यप्रणाली देखिए उर्जा निगम के उच्चाधिकारियों ने समाचार का संज्ञान लेकर तुरन्त व्यवस्था ठीक करने की बात कही, समाचार मे छपे चार पोलों पर कार्य कर सब दुरस्त हो गया की घोषणा हो गई। आनन फानन मे तुरन्त सरकार के स्तर से सूचना विभाग के माध्यम से एक प्रेस नोट भी जारी हो गया कि ‘‘ समस्या के समाधान पर जनता ने मुख्य मंत्री का आभार प्रकट किया’’ यहां उल्लेखनीय है कि अगर समस्या का समाधान हो गया होता तो जनता को पुन; बिजली विभाग को लम्बा चौड़ा पत्र क्यों लिखना पडा ?

जब हमने इस क्षेत्र की बिजली समस्या का फाॅलोअप किया तो पाया कि केवल उन्ही चार खम्बों पर काम हुआ जो समाचार मे छपे थे। ग्रामीणों ने बताया कि सारे क्षेत्र मे अभी भी दर्जनो पोल झुके हैं, तार आपस में टकरा रहे हैं, तार हरे पेड़ों पर उलझ रहे हैं, जो खतरे को बुलावा दे रहे हैं। खेतों के बीच लगे खम्बों की तारों व ट्राॅसफार्मरों से अक्सर चिन्गारियां निकलती हैं।

खेतों में काम करने वालों के लिए हमेशा जोखिम बना हुआ है। प्राथमिक विद्यालय के पास से हाईटेन्सन लाइन गुजर रही है। उसके तार चीड़ के पेडों पर उलझे हैं, जो छोटे बच्चों के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। पोलों के मध्य अधिक दूरी व बन्द पडे ट्राॅसफार्मरों के कारण वोल्टेज ड्राप की समस्या आम है। आज तक बिजली की लाइनों से टकरा रहे की पेड़ों की टहनियों की लाॅपिंग का कार्य कभी नही हुआ।

यहां यह उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र की बिजली व्यवस्था का रख-रखाव, देखभाल का कार्य ठेके पर दिया गया है। जब जनता को अक्सर अन्धेरे मे रात गुजारनी पड रही हो, तो ठेकेदार को अनुरक्षण व अन्य कार्य मद से  किस एवज से भुगतान किया जाता रहा। जब सारी बिजली व्यवस्था चरमराई हुइ है तो रख-रखाव व देखभाल के नाम पर खर्च किस एवज मे अब तक होता आया है ! यह एक बड़ी जांच का विषय है।

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जनता ने सिलसिलेवार क्षेत्र की  बिजली की समस्या का पत्र प्रबन्ध निदेशक उर्जा निगम को भेजा है। अब देखना है कि सरकार  व विभाग जनता की समस्या का निदान हेतु संजीदा है या केवल विज्ञापन होर्डिंग्स, समाचार पत्रों तक ही जनता का भला करने की बात करते हैं ।

इस बात की भी जांच होगी कि बिजली लाइनें सुधारे बिना  अब तक जो भुगतान अनुरक्षण के नाम पर हुआ उसके लिए कौन जिम्मेदार है ! जीरो टालरेंस की डबल इंजन सरकार उन अधिकारियों व कर्मचारीयों पर कोई कार्यवाही करेगी? जो इसके लिए जबाबदेह हैं !

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