जानिए वीर भड़ों और न्याय की कुर्सी वाली दास्तान

हाथियों के बल वाले वीर भड़ो की याद दिलाती न्याय की कुर्सी। न्याय की कुर्सी के साथ बदलते दौर में हो रहा अन्याय। संरक्षण की दरकार।
गिरीश गैरोला
दादी नानी से कथा कहानियों में सुना था कि पहाड़ों में निवास करने वाले हमारे पुरखे हाथियों जैसे बल और लंबे चौड़े शरीर वाले थे। उनकी शारीरिक शक्ति के कई किस्से आज भी लोक गीतों में मौजूद हैं। वे बलशाली वीर भड़ आज हमारे बीच नही हैं, किंतु उनकी निशानियां आज भी उन्हें याद करने को मजबूर करती है।
उत्तरकाशी से केदारनाथ मोटर मार्ग पर धौंत्री गांव में पौराणिक न्याय की कुर्सी इसी रूप में मौजूद हैं, इनकी बनावट से हमे अहसास हो जाता है कि कुछ पीढ़ियों पूर्व पहाड़ की कंदराओं में निवास करने वाला इंसान कितना बलशाली और तकनीकी रूप में दक्ष रहा होगा।
टिहरी राजशाही के समय जब उत्तरकाशी जनपद भी  टिहरी रियासत का ही एक हिस्सा भर था, उस जमाने से ही इस गांव में ये न्याय की कुर्सी मौजूद है। इतिहास के जानकार बताते हैं कि टिहरी नरेश की पैदल यात्रा जब इस मार्ग से गुजरती थी तब आसपास के दर्जन भर गांव के लोगों को संबोधित करने के लिए राजा इस न्याय की कुर्सी पर विराजमान होते थे।
कालांतर में टिहरी रियासत के भारत सरकार में विलय के बाद राजशाही विलुप्त  हो गयी। सड़क निर्माण हुए तो  इस न्याय की कुर्सी का उपयोग देव डोलियों के विश्राम के लिए होने लगा। बताते चलें कि पूर्व से ही देव डोलियां पर्व त्योहारों पर गंगा स्नान के लिए यात्रा करती आई हैं।  इसके अलावा विशेष पूजा और सामूहिक देव कार्यो में भी देव डोलियों को इसी न्याय की कुर्सी पर स्थान दिया जाता रहा है। आज जब गांव-गांव  तक सड़क सुविधा हो गयी है और ज्यादातर लोग बेहतर शिक्षा स्वास्थ्य के लिये गांव से पलायन कर गए हैं, तब से  न्याय की इस  कुर्सी के साथ ही अन्याय होने लगा है। न्याय की इस पौराणिक कुर्सी के चारों तरफ झाड़ियां उगने लगी हैं।
अपने परिवार सहित यहां घूमने आए प्रकृति प्रेमी नंद किशोर सिंह ने आश्चर्य जताया कि वर्षो पूर्व जब आज के जितनी आधुनिक जेसीबी मशीन नही थी,  उस दौर में जब ऋषिकेश से ऊपर सड़के भी नही थी तब इतने बड़े भारी और भारी पत्थरों को तराश कर चिनाई में लगाना कितना मुश्किल रहा होगा,  फिर भी वीर भड़ विशालकाय इंसानों ने अपने पारंपरिक ज्ञान औए ताकत के बल पर इस न्याय की कुर्सी का निर्माण कराया होगा।
गाव के प्राधन पति मोहन लाल बहुगुणा बताते है कि इस स्थान का उपयोग आज भी धार्मिक कार्यो में किया जा रहा है । देव डोलिया आज भी यहाँ विश्राम करती है।इस स्थान को  सूचना केंद के रूप में उपयोग  किया जाता रहा है। ओर टिहरी से उत्तरकाशी तक पहुचने वाले पैदल मार्ग का ये मुख्य पड़ाव  रहा था।
बदलते दौर में अपने पुरखों के शारीरिक बल और तेज दिमाग के  प्रतीक पौराणिक न्याय की कुर्सी आज खुद  उपेक्षा और अन्याय की शिकार है। चार धाम यात्रा मार्ग पर होने के बाद भी पर्यटन विभाग की निगाहों से दूर इस स्थल को सरकारी संरक्षण की दरकार है।

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