विधान सभा गैरसैंण ‘पिकनिक’ पर दो करोड़ खर्च। पेयजल, PWD, राज्य संपत्ति का खर्चा अलग

 गैरसैंण में विधानसभा सत्रों के आयोजन को लेकर हो रहे भारी भरकम खर्चों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। भाजपा हो या कांग्रेस, जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह गैरसैण में विधानसभा सत्र आयोजित करने में हो रहे खर्चों को लेकर एक दूसरे पर सवाल उठाती रही है।
 कांग्रेस के कार्यकाल में 3 विधानसभा सत्र गैरसैण में आयोजित किए गए, जबकि भाजपा के कार्यकाल में अभी तक सिर्फ एक बार गैरसैण में सत्र आयोजित किया गया है। आरटीआई एक्टिविस्ट तथा सामाजिक कार्यकर्ता गुरविंदर सिंह चड्ढा ने सूचना के अधिकार में जब विधानसभा सचिवालय से यह जानकारी मांगी कि कुल कितने दिन गैरसैण में सत्र आयोजित हुआ तथा कितना खर्चा हुआ और कितने विधायक प्रत्येक सत्र में उपस्थित रहे तो विधानसभा सचिवालय ने अपने कार्यालय द्वारा हुए खर्च का ब्यौरा तो दे दिया किंतु विधायकों की संख्या की सूचना को प्रक्रियागत बताते हुए प्रदान करने से फिलहाल असमर्थता जता दी।
 साथ ही कहा कि अन्य विभागों द्वारा किए गए खर्च का ब्यौरा उपलब्ध नहीं है।
 विधान सभा द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2014 में 3 दिन के सत्र पर 57,09,126 रुपए खर्च हुए थे। वर्ष 2015 में 2 दिन के सत्र पर मात्र 2,77, 817 रुपए खर्च हुए। वर्ष 2016 में 2 दिन के सत्र पर यह खर्च 36,29,870 रुपए था। जबकि भाजपा के कार्यकाल में मात्र 2 दिन के लिए आयोजित होने वाले इस सत्र में यह खर्च 98लाख 69हजार,395 रुपए था। दिनों के हिसाब से देखें तो गैरसैण मे 4 बार अब तक विधानसभा सत्र आयोजित हो चुका है और कुल 9 दिन गैरसैण में विधानसभा सत्र चला।
 विधानसभा की ओर से इसमें कुल खर्चा 1करोड़ 94 लाख86 हजार 208 रुपये आया।
 इस खर्चे में केवल विधानसभा सचिवालय द्वारा किया गया खर्च का ब्यौरा दिया गया है। जबकि राज्य संपत्ति विभाग, लोक निर्माण विभाग, पेयजल विभाग आदि के खर्चे अलग से हैं। यह भी करोडों मे होगा ।
 गौरतलब है कि पिछले सरकार के कार्यकाल में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल गैरसैंण में स्थाई राजधानी बनाने की पुरजोर पैरवी करते रहे हैं तथा वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल भी गैरसैण में ही स्थाई राजधानी के प्रबल पक्षधर हैं। यदि विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल की बात सरकार मान लेती है तो गैरसैंण में विधानसभा सत्र के आयोजन की सार्थकता सिद्ध हो सकती है। अन्यथा यह खर्च केवल गैरसैंण के नाम पर विधायकों की पिकनिक के तौर पर ही देखा जाएगा।
 आरटीआई एक्टिविस्ट गुरविंदर सिंह चड्ढा कहते हैं कि गैरसैण  में विभिन्न व्यवस्थाओं का आयोजन करने वाले प्रतिष्ठानों को अभी तक उनके काम का भुगतान नहीं किया गया है, जबकि उन्होंने जीएसटी भी एडवांस में जमा कर दिया है। यदि सरकार गैरसैण में स्थाई राजधानी नहीं बनाती है तो इस तरह के सत्रों का आयोजन करके करोड़ों रुपए फूंकने  का भी कोई औचित्य नहीं बनता।

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