उत्तराखण्ड में गुरू को चाहिए शिष्य का सिर!

 पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को अब अंगूठा नहीं, बल्कि शिष्य का सिर चाहिए

न्यायालय द्वारा मिली फटकार के बाद उत्तराखंड सरकार कर रही अब उच्चतम न्यायालय जाने की तैयारी

सरकार बनाम् मंदिर समिति की बजाय सतपाल महाराज बनाम् गणेश गोदियाल

गजेंद्र रावत//

द्वापर युग में गुरू द्रोण को जब ज्ञात हुआ कि उनके अनजान शिष्य एकलव्य उनके प्रिय शिष्य अर्जुन से धनुर्विद्या में कई गुना आगे निकल चुके हैं और वे अर्जुन को एकलव्य जैसी निपुणता नहीं दिला सकते तो द्रोणाचार्य ने अर्जुन के प्रेम में एकलव्य से गुरू दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा मांग लिया, ताकि एकलव्य की प्रतिभा वहीं खत्म हो जाए। कलियुग में देवभूमि उत्तराखंड में उसी प्रकार का प्रकरण कभी राजनैतिक गुरू रहे सतपाल महाराज और गणेश गोदियाल के बीच चल रहा है। अंतर इतना है कि पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को अब अंगूठा नहीं, बल्कि शिष्य का सिर चाहिए।
२८ जुलाई की शाम को उत्तराखंड शासन ने एक पत्र जारी किया, जिसमें उसी दिन दोपहर को बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति की ओर से आयोजित बोर्ड की बैठक के सभी निर्णयों को असंवैधानिक करार देना लिखा गया। हालांकि बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ने बोर्ड की यह बैठक उच्च न्यायालय के उस आदेश के बाद की, जिसमें न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार द्वारा लगातार दूसरी बार मंदिर समिति को भंग करने का आदेश देने के बाद पहली स्थिति को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देते हुए न्यायिक प्रक्रिया जारी रखने का भी आदेश दिया था। https://parvatjan.commaharaj-ko-thenga-dikhate-angootha-lagane-waleन्यायालय द्वारा मिली फटकार के बाद उत्तराखंड सरकार अब उच्चतम न्यायालय जाने की तैयारी कर रही है।
न्यायालय के आदेश के बाद हुई बोर्ड की बैठक को असंवैधानिक करार देने के बाद अब सरकार पर न्यायालय की अवमानना का भी संकट गहरा रहा है। बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति और उत्तराखंड सरकार के बीच की ये रार सरकार बनाम् मंदिर समिति की बजाय सतपाल महाराज बनाम् गणेश गोदियाल है। गणेश गोदियाल सतपाल महाराज के कहने पर भाजपा में शामिल नहीं हुए। तब से सतपाल महाराज गणेश गोदियाल को सबक सिखाने के कई प्रयास कर चुके हैं। विधानसभा चुनाव २०१७ में गोदियाल को हराने के लिए भी महाराज ने तमाम कोशिशें की। चूंकि मंदिर समिति का कार्यकाल अभी शेष है और उसे भंग करने का सरकार के पास कोई अधिकार नहीं था। इसके बावजूद सतपाल महाराज ने अपने पुराने शिष्य को ठिकाने लगाने की नियत से समिति को भंग करने का आदेश जारी करवाया। बोर्ड की बैठक को असंवैधानिक करार देने के बाद मंदिर समिति के लोग पुन: न्यायालय की शरण में हैं।
गणेश गोदियाल अब इसे महाराज की भांति ही प्रतिष्ठा से जोड़कर लड़ रहे हैं। बोर्ड की बैठक के बाद भी उन्होंने वक्तव्य जारी किया था कि वे नियमानुसार अपना कार्य कर रहे हैं और सरकार जो चाहे करे। सतपाल महाराज के देश से बाहर होने के बावजूद जिस प्रकार सतपाल महाराज ने मंदिर समिति के प्रति रुख अख्तियार किया हुआ है, वह काफी रोचक है।
भाजपा के सूत्रों के अनुसार पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज एक बड़े प्रोजेक्ट को मंदिर समिति के माध्यम से अंजाम देना चाह रहे थे, किंतु मंदिर समिति में अध्यक्ष के पद पर गोदियाल के बने रहने से महाराज की मंशा पर पानी फिर गया। यहीं से गुरू और शिष्य के बीच द्वंद शुरू हो गया। विषय एक बार फिर न्यायालय की ओर बढ़ रहा है। देखना है कि गुरू और शिष्य का अगला कदम क्या होता है!

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