जनता के लिए नहीं, कमीशन के लिए बनी यह योजना!

इन्द्र सिंह नेगी // किसी भी ये योजना के निर्माण से पहले उसका पूर्व आंकलन किया जाता है कि उस योजना से कितने लोग लाभान्वित होंगे, कितने वर्षों तक योजना लाभ देगी! खर्च क्या होगा! इसके प्रभाव क्या रहेगें! आदि-आदि, लेकिन यदि ऐसा ना किया जाय तो समझा जाना चाहिए कि इसका पूर्वआकंलन ठीक से […]

इन्द्र सिंह नेगी //

किसी भी ये योजना के निर्माण से पहले उसका पूर्व आंकलन किया जाता है कि उस योजना से कितने लोग लाभान्वित होंगे, कितने वर्षों तक योजना लाभ देगी! खर्च क्या होगा! इसके प्रभाव क्या रहेगें! आदि-आदि, लेकिन यदि ऐसा ना किया जाय तो समझा जाना चाहिए कि इसका पूर्वआकंलन ठीक से नहीं किया गया है व योजना का निर्माण मात्र बजट को ठिकाने लगाने के लिए किया गया है।

यहां हम इसी प्रकार की बजट खपाऊ व खाऊ योजना का जिक्र कर रहे हैं, जिसमें खर्च तो करोड़ों हुए हैं लेकिन वह लाभ के नाम पर परेशानी का कारण बन चुकी है।

उत्तराखंड मण्डी परिषद के सौजन्य से 10 अक्टूबर 2002 वृहस्पतिवार को तत्कालीन कृषि मंत्री श्री महेंद्र सिंह माहरा के कर कमलों द्वारा उस समय के पंचायती राज मंत्री, कांग्रेस के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष व चकराता के विधायक श्री प्रीतम सिंह की अध्यक्षता में क्वांसी से इस क्षेत्र के दो दूरस्थ गांवों- बनियाना एवं खाटवा के लिए तथाकथित रूप से विकास की एक अनोखी पहल- रोप वे का शिलान्यास किया गया ।

इस रोपवे का निर्माण इस आशय से किया गया कि सड़क से दूर होने के कारण इन गांवों के जो लोग अपनी कृषि उपज पीठ पर या घोड़े-खच्चरों के माध्यम सड़क तक पहुंचाते थे उनका बोझ कम हो सके।

ये महात्वाकांक्षी करोड़ों की योजना लगभग एक वर्ष तक बन कर तैयार हुई, स्वीकृति के समय अनेक प्रकार के दावे-प्रतिदावे योजनाकारों द्वारा किये गये,  ग्रामीणों के मुताबिक एक साल तक लोगों के कृषि उत्पाद इसके माध्यम से क्वांसी स्थित पुल के पास मुख्य मार्ग तक पहुंचे। कई बार लोगों की बोरियां व कट्टे अर्ध-राह पर गिरते भी रहे।

लोगों से मालभाड़ा वसूला भी गया बिना किसी रसीद के, वो कहां गया किसी के पास इसका जवाब नहीं है। इसके बाद से इस रोपवे का कभी उपयोग हुआ हो लोगों को इसका ध्यान नहीं है ।क्वांसी से बनियाना के पैदल मार्ग पर चलते हुए रोपवे की राह है, इसी प्रकार खाटवा की तरफ भी है, इसकी तारों के नीचे लोगों की उपजाऊ कृषि भूमि, चारागाह, छानियां व घर है, जहां लोग खेतीबाड़ी व पशुओं से सम्बंधित कार्य करते है । रोपवे के खम्भों पर जंग लग चुका है व नीचे से गल रहे हैं, अमूमन ऐसे खम्भों की जड़ में डेकच्यून का प्रयोग किया जाता है ।

आज इस रोपवे की हालत ये हो रखी है कि जहां इसकी स्वीकृति व निर्माण के समय बड़े-बड़े दावे किये जा रहे थे, वहीं आज ये लोगों के लिए भूलभुलैया साबित हो खतरे का सबब बन चुकी है।

ट्रालियों का पता नहीं, इंजन चोरी हो चुके हैं। तारें व खम्बे लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं। वे कभी भी गिर कर किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं । लोगों का तो क्या! वो पहले भी ढो रहे थे व आज भी पीठ पर या घोड़े-खच्चरों के माध्यम से अपना सामान ढोने पर मजबूर हैं।

इसका परिणाम यह है कि खाटवा व बनियाना दोनों गांवों में कई दर्जन घोड़े व खच्चरों के जोड़े हैं । बनियाना के प्रधान श्री शुरवीर सिंह  का कहना है कि सरकार इस सामान को ले जाये  क्योंकि अब तो इसकी मरम्मत भी सम्भव नहीं है।

अब प्रश्न उठता है कि बिना ठोस नियोजन के इस प्रकार की करोड़ों की योजनाओं का निर्माण करने से किसका हित सधता होगा  (?)

कहने की आवश्यकता नहीं लगती! आसानी से समझा जा सकता है । इस प्रकार की योजना लोगों के दर्द को कम करने के लिए नहीं, बल्कि दु:ख बढ़ाने के लिए बनाई गई प्रतीत होती हैं। साथ ही योजनाजीवी लोगों के हित सधते हैं बस।

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