जरूर पढ़ें:अफसरों से कहो राज्य के लिए भी दौडें!

सिर्फ अपने विकास के लिए दौड़ नेता-अफसर  रतन सिंह असवाल कल विकास देहरादून की सड़कों पर दौड़ रहा था अलग बात है कि उसने किसके विकास को दौड़ लगाई होगी? राज्य गठन से अभी तक का तजुर्बा तो यही बताता है कि विकास ने अभी तक अपने लिए ही दौड़ लगाई है। साढे पंद्रह हजार […]

सिर्फ अपने विकास के लिए दौड़ नेता-अफसर 
रतन सिंह असवाल
कल विकास देहरादून की सड़कों पर दौड़ रहा था अलग बात है कि उसने किसके विकास को दौड़ लगाई होगी?
राज्य गठन से अभी तक का तजुर्बा तो यही बताता है कि विकास ने अभी तक अपने लिए ही दौड़ लगाई है।
साढे पंद्रह हजार गांवों के इस पर्वतीय प्रदेश के लिए प्रचलित कहावत “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी ”  कभी पहाड़ के काम नही आती है पर प्रदेश के पेयजल विभाग ने भी इस प्रचलित कहावत पर अपनी मोहर लगा दी । विभाग शहरों को 16 घंटे प्रतिदिन पानी की आपूर्ति देगा ऐसा समाचार पत्रों मे पढने को मिला है। मतलब साफ है कि सरकार की प्राथमिकता गांव नही है। बात यदि ग्रामीण पेयजल व्यवस्था की हो तो गांवों में धरातलीय स्थिति क्या है, किसी से छुपा नही है। ऊपर से तुर्रा ये है कि हम सम्पूर्ण खुले मे शौचमुक्त प्रदेश है ?
पिछले महीने 14 अक्टूबर की ही बात है। सूबे के कृषि और उद्यान मंत्री जी ने मोबाइल पर किसानों को संबोधित करते हुए उनके क्षेत्र आराकोट मे एक अदद कलेक्सन सेंटर खोलने की बात कही थी। लेकिन जो सूची मंडी समिति ने जारी की है, उसमें यह क्षेत्र स्थान नही बना सका । बताते चलें  प्रदेश का सेब उत्पादन इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा होता है।
भाजपा काले धन के विरोध मे पिछले चार साल से मार्च निकाल रही है लेकिन ये किसी को नही पता कि काला धन कहां है और कब स्वदेश लौटेगा ?
पूरे शहर मे कांग्रेस के नेताओं के मुस्कराते हंसते फ़ोटो वाले बैनर पोस्टरों से पता चला कि वे नोटबन्दी के विरोध में  काला दिवस मना रहे हैं । मनावा भै कैल मना कैरी….लेकिन विरोध दिवस पर चेहरे मुस्करा क्यों रहे है ?
बात यदि आम आदमी और विशेष कर गृहणी की करें तो उनका कहना है कि नोटबन्दी से उनकी किचन पर असर पड़ा है… महंगाई बड़ी है … न दालों के भाव गिरे न साग भाजी सस्ती हुई , नूंन तेल ने रुला रखा है। आटा चावल के साथ गैस भी महंगी हुई है । तो भई फिलहाल फील गुड वाली बात तो कहीं नजर आती नही ।
भाई लोगों ये धरने प्रदर्शन , दौड़, सफेद दिवस काला दिवस किसके लिए और क्यों ?
असल बात ये है कि राज्य आंदोलन जिस बात के लिए हुआ था, दोनों दल उन मुद्दों की बजाय अपने राष्ट्रीय एजेंडा पर काम करते आए हैं और वर्तमान मे भी वही कर रहे हैं। राज्य गठन के 17 सालों की एक भी उपलब्धि गिना दे ना दोनों राष्ट्रीय दल ?
पर्वतीय प्रदेश की राजधानी गैरसेंण को आपने फुटबॉल बना दिया है। शिक्षा, स्वस्थ्य,चकबन्दी, वैज्ञानिक खेती, औद्यानिकी, सिंचाई, बाल विकास, महिला सशक्तिकरण,युवाओं के लिए रोजगारपरक शिक्षा, पर्यटन विकास ,कृषि भूमि की बिक्री पर रोक एक भी तो उपलब्धि गिना दो ना ? प्रदेश पर बढ़ता कर्ज का बोझ और लगातार बढ़ रही बेरोजगारों की संख्या को आप किस नजरिये देख रहे है जरा ये भी बता दो ?
उल्टे मानव तस्करी , धर्मान्तर और प्रदेश मे बढ़ती भिखारियों की फौज की समस्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है और आप मौन हैं ………  सही रैबार नही जा रहा है भैज्यूँ देश दुनिया मे….
प्रदेश के हित मे ये जुमलेबाजियां और ज्यादा नही चलने वाली है । जनता आप दोनों दलो को बार बार चुनकर असल मुद्दों पर आने को कह रही है लेकिन आप हैं कि प्रदेश गठन की मूल अवधारणा के मूल मुद्दों पर वापस आने को तैयार ही नही । सोचिएगा जरा ठंडे दिमाग से मनन जरूर कीजिएगा क्या यही थी राज्य आंदोलन और आपके सपनों के प्रदेश की परिकल्पना ?
रैबार ठीक नही जा रहा है भैज्यूँ

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