टॉप अफसरों में गैंगवार, ईडी की भी जांच

वन विभाग में आजकल प्रमुख वन संरक्षक जयराज और मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव डीबीएस खाती के बीच चल रहा द्वंद युद्ध धीरे- धीरे चरम पर पहुंचने लगा है।
खाती ने पलटवार के रूप में जयराज के करीबी एक एनजीओ संचालक के एनजीओ की जांच करने की मांग इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट( ईडी) से की है। खाती ने एनजीओ पर मनी लॉन्ड्रिंग के दृष्टिकोण से जांच करने की जरूरत बताई है।
वन विभाग के इन दोनों उच्चाधिकारियों के बीच तनातनी  ऐसे शुरू हुई  कि डीबीएस खाती ने प्रमुख वन संरक्षक जयराज की पत्नी द्वारा पाले जा रहे बंदरों पर आपत्ति जताते हुए इस मामले को मीडिया में उछाला तो जयराज ने डीबीएस खाती के क्षेत्र में गुलदार की हत्या के मामले को लेकर डीबीएस खाती की घेराबंदी शुरू कर दी।
 राजाजी पार्क के क्षेत्र में गुलदार की हत्या के इस मामले में अब तक 3 लोग जेल चले गए हैं। इसके जांच अधिकारी कोमल सिंह पर आरोप है कि वह डीबीएस खाती के गुट के हैं।
 जयराज द्वारा बिठाई गई जांच में यह माना जा रहा था कि इस बात से डीबीएस खाती की ठीक से घेराबंदी हो जाएगी। किंतु जांच ने दूसरी दिशा पकड़ ली और यह निष्कर्ष निकलने लगा कि गुलदार की हत्या साजिशन फंसाने के लिए उच्चाधिकारियों द्वारा कराई गई है।  खाती ने अपर मुख्य सचिव रणवीर सिंह के माध्यम से इस मामले की जांच एसआईटी से कराने की भी सिफारिश की थी।
 अब जबकि 3 लोग इस मामले में जेल चले गए हैं तो ऐन जांच के बीच में जयराज ने यह जांच तीखे तेवरों के लिए चर्चित IAS अफसर संजीव चतुर्वेदी को सौंप दी।
 जांच अधिकारी बदलने पर डीबीएस खाती ने कड़ा एतराज जताया है और कहा कि जांच अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार सिर्फ वाइल्ड लाइफ वार्डन को है ना कि प्रमुख वन संरक्षक को।
 इधर डीबीएस खाती ने पलटवार के रूप में जयराज के करीबी और वन्यजीवों की संरक्षण के नाम पर एनजीओ चलाने वाले राजीव मेहता के एनजीओ “ऑपरेशन टाइगर आई” की शिकायत ईडी में दर्ज करा दी। डीबीएस खाती ने 6 अप्रैल को ईडी को पत्र लिखा था कि राजीव मेहता के एनजीओ ने वन्यजीवों के संरक्षण के नाम पर 1करोड35लाख रुपए विदेशी संस्था से फंडिंग ली, लेकिन ना तो इसके खर्चे का कोई हिसाब-किताब और ना ही प्रोजेक्ट रिपोर्ट वन विभाग को सौंपी।
 खाती ने बताया कि  वर्ष 2012-13 और 15-16 में एनजीओ  ने  विभिन्न फॉरेन फंडिंग एजेंसी से फंडिंग ली थी , लेकिन कोई काम नहीं किया।
 इस फंडिंग से NGO का काम राजा जी और कॉर्बेट के क्षेत्रों में बाघ संरक्षण के कार्यों की मॉनिटरिंग करना था। इन क्षेत्रों में जाने के लिए वन विभाग की परमिशन चाहिए होती है, लेकिन राजीव मेहता के एनजीओ ने यह परमिशन नहीं ली।
 “इसका मतलब यह है कि इन्होंने कोई मॉनिटरिंग ही नहीं की।” डीबीएस खाती ने एनजीओ के कर्ताधर्ता राजीव मेहता पर फॉरेन फंडिंग के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए ईडी से इसकी जांच करने की संस्तुति तो की ही साथ ही फॉरेन फंडिंग करने वाली एजेंसी को भी इस संस्था की जांच कराने के लिए पत्र लिखा है।
 जाहिर है कि गुलदार की हत्या के मामले में इस एनजीओ की भूमिका भी संदिग्ध के रूप में देखी जा रही है। ऐसे में डीबीएस खाती ने खुद पर सवाल खड़े होते देख एनजीओ को भी लपेटे में ले लिया।
 एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट( ईडी) के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने एनजीओ के दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है। हालांकि पर्वतजन के सूत्रों के अनुसार इस गैंगवार को बढ़ते देखकर मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी हस्तक्षेप किया है और वन मंत्री भी अपर मुख्य सचिव वन रणवीर सिंह के साथ इस मामले पर मध्यस्थता करने की बात कह चुके हैं।
इसमें एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि डीबीएस जुलाई में रिटायर होने जा रहे हैं। जबकि जयराज का अभी 2 साल से अधिक का कार्यकाल बचा हुआ है। देखना यह होगा कि आगे क्या परिणाम निकलता है!
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