पूर्व मुख्य सचिव की खुली पोल

भर्तियों में अनियमितता के गंभीर आरोप

कु. दिव्या सूद हिमाचल से है और इस प्रकार हिमाचल प्रदेश के अन्य अभ्यर्थियों को भी बैकडोर से एंट्री!

शशि भूषण मैठाणी

पूर्व मुख्य सचिव तथा विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष पर अपने कार्यालय में भर्तियों में अनियमितता के गंभीर आरोप लग रहे हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने चहेतों को भर्ती करने के लिए भर्ती के मापदंडों में मनमानी की है। कई पदों की भर्तियां बिना किसी विज्ञप्ति के नियमों को ताक पर रखकर की गई हैं। अब आयोग मनमाने ढंग से भर्ती नियमों में निर्धारित नियमों को बदलकर पहले की ही तरह अनियमितता करने जा रहा है। जिसमें उत्तराखंड के युवाओं की भर्ती की कोई संभावना नहीं है। उन पर आरोप है कि विशेष महिला अभ्यर्थी कुमारी दिव्या सूद की नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिए मानदंडों में बदलाव किया गया है। कु. दिव्या सूद हिमाचल से है और इस प्रकार हिमाचल प्रदेश के अन्य अभ्यर्थियों को भी बैकडोर से एंट्री दी जा रही है। सुभाष कुमार मूल रूप से हिमाचल के रहने वाले हैं, इसलिए इस भर्ती प्रक्रिया को भी उनके हिमाचल कनेक्शन से जोड़कर देखा जा रहा है। कु. दिव्या सूद पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी की पहली विद्यार्थी है। पहले बैच में कुल १२ विद्यार्थी थे तथा दिव्या सूद ने अपनी क्लास में टॉप किया होगा। इस तरह से वह तकनीकि रूप से यूनिवर्सिटी की टॉपर भी कहलाई, क्योंकि न तो उससे पहले कोई बैच था और न ही उनके साथ किसी और कक्षा की परीक्षाएं हुई। इस तकनीकि उपलब्धि को सुभाष कुमार ने अपने विभाग में नियुक्ति का मापदंड बनाते हुए १० नंबरों के अतिरिक्त वेटेज निर्धारित कर दिए।
१६ नवंबर २०१६ को जारी विज्ञप्ति में आयोग ने १० प्रतिशत अंक यूनिवर्सिटी टॉपर के लिए निर्धारित किए थे, जबकि यह भारत की किसी भी भर्ती प्रक्रिया में प्रचलित नहीं है। अखिल भारतीय महिला पंचायत की अध्यक्ष उषा नेगी वंचित युवकों की अगुवाई करने के लिए सुभाष कुमार से भी मिली थी, किंतु कोई परिणाम नहीं निकला। उषा नेगी का कहना है कि आयोग के अध्यक्ष अपने अधिकारों का दुरुपयोग व्यक्ति विशेष को लाभ देने के लिए कर रहे हैं। उषा नेगी ने चयन समिति पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा कि कमेटी द्वारा जो मानक बनाए गए हैं, न तो वे तर्कसंगत हैं और न ही व्यवहारिक हैं। हालांकि सुभाष कुमार का तर्क है कि कई सरकारी विभाग गोल्ड मेडलिस्ट को बिना किसी परीक्षा के सीधे अपने यहां नौकरी पर रख लेते हैं तो वे कहां से गलत हो गए!
देखना यह है कि जीरो टोलरेंस की सरकार इसका कितना संज्ञान ले पाती है।

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