प्रेमनगर थाने में चल रही दारोगा जी की पाठशाला, सौ बच्चे आते हैं रोजाना पढऩे

कुलदीप एस राणा शिक्षा का उजियारा फैलाते दारोगा मुकेश त्यागी खाकी की बर्बरता के किस्से तो आपने अक्सर सुने होंगे, लेकिन उसी खाकी के पीछे के इंसान के मानवीय चेहरे को देख लीजिए। आज हम देहरादून पुलिस के ऐसे ही एक अधिकारी के कार्यों से आपको रूबरू करवा रहे हैं। मंगलवार का दिन था। यह […]

कुलदीप एस राणा

शिक्षा का उजियारा फैलाते दारोगा मुकेश त्यागी

खाकी की बर्बरता के किस्से तो आपने अक्सर सुने होंगे, लेकिन उसी खाकी के पीछे के इंसान के मानवीय चेहरे को देख लीजिए। आज हम देहरादून पुलिस के ऐसे ही एक अधिकारी के कार्यों से आपको रूबरू करवा रहे हैं।
मंगलवार का दिन था। यह संवाददाता प्रेमनगर से गुजर रहा था। इसी बीच उनकी नजर पुलिस थाने पर पड़ी। वहां के दृश्य को देख यकायक उन्होंने अपनी गाड़ी थाने की तरफ मोड़ दी। पुलिस थाना अक्सर अपराधियों की सरगर्मियों का केंद्र रहता है, जहां जाने से आम आदमी हमेशा बचने का प्रयास करता है, किन्तु प्रेमनगर थाना का दृश्य कुछ और ही था।


पुलिस थाना परिसर में बायीं तरफ बच्चों के पढऩे की आवाजें आ रही थी। दरअसल यह थाने में चल रही एक छोटी सी पाठशाला थी, जहां एक शिक्षिका बच्चों को पढ़ाने में तल्लीन थी। पूछताछ करने पर पता चला कि दारोगा मुकेश त्यागी की पहल पर यह पाठशाला चल रही हैं, जहां पर थाना क्षेत्र के अंतर्गत पडऩे वाले झुग्गी झोपडिय़ों के बच्चों को आश्रेय नाम के एक ट्रस्ट के माध्यम से पढ़ाया जाता है।

उक्त पाठशाला में लगभग 80 से 100 बच्चे रोजाना पढ़ते हैं। इन गरीब बच्चों के लिए कापी-किताब, कपड़े इत्यादि की व्यवस्था दारोगा मुकेश त्यागी और ट्रस्ट साथ मिलकर करते हैं। त्यागी की यह पहल प्रेमनगर क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। पुलिस की जिम्मेदारियों के साथ साथ मुकेश त्यागी इस छोटी सी पाठशाला की जिम्मेदारीयों को भी बखूबी निभा रहे हैं।
थाने की पाठशाला में पढऩे आने वाले बच्चों के लिए रोजाना नाश्ता व दिन के भोजन की व्यवस्था दारोगा समाज के जागरूक नागरिकों की मदद से करते हंै। बाहर से सख्त नजर आने वाले मुकेश त्यागी ने इस संवाददाता से बातचीत के दौरान बताया कि कुछ महीने पहले क्षेत्र भ्रमण के दौरान उन्होंने सड़क के किनारे इन बच्चों को पढ़ते देखा। पूछताछ से पता चला कि आश्रेय ट्रस्ट के कार्यकर्ता इन बच्चों को पढ़ाते हैं। सड़क किनारे होने से बच्चे कभी भी दुर्घटना के शिकार हो सकते थे, तो मैंने थाना परिसर में ही बच्चों को पढ़ाने की व्यव्यस्था सुनिश्चित की। बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्साह को देखकर अब मैं पाठशाला के लिए एक छोटा सा कमरा बनवाने हेतु प्रयासरत हूं। पुलिस के संरक्षण में होने से बच्चे भिक्षाटन व चोरी-चकारी से भी दूर हैं। दारोगा त्यागी की इस मानवीय पहल ने पुलिस को समाज में एक नई पहचान देने का काम किया है।

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