भाजपा सरकार मे संस्कृत के साथ यह भेदभाव जानकर दंग रह जाएंगे आप !

उत्तराखंड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। किंतु संस्कृत शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए हमारे नीति-नियंता सिर्फ खबरों में बने रहने के लिए प्रयासरत रहते हैं। धरातल पर कहीं भी कुछ नहीं हो रहा है। भाजपा की सरकार आने के बाद 6 महीनों में सरकार ने विधानसभा भवन के ऊपर लगी होर्डिंग  […]

उत्तराखंड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। किंतु संस्कृत शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए हमारे नीति-नियंता सिर्फ खबरों में बने रहने के लिए प्रयासरत रहते हैं। धरातल पर कहीं भी कुछ नहीं हो रहा है। भाजपा की सरकार आने के बाद 6 महीनों में सरकार ने विधानसभा भवन के ऊपर लगी होर्डिंग  में विधानसभा भवनम लिखकर एक दिन की सुर्खियां बटोरी और भूल गई।
 नाम पट्टिका चेंज करने की यह कवायद भी सचिवालय आते-आते निष्प्राण हो गई। सचिवालय में अधिकांश भवनों के नाम महापुरुषों के नाम पर रखे गए हैं, किंतु यहां भवन को भवन ही लिखा गया है भवनम नहीं।
 यह तो थी सरकार की सांकेतिक कवायद की असलियत! अब आते हैं धरातल पर संस्कृति की असलियत पर। हिंदी भाषी स्कूलों की तुलना में संस्कृत शिक्षा वाले स्कूलों के साथ काफी भेदभाव हो रहा है।
 सरकार संस्कृति स्कूलों के प्रति बिल्कुल उदासीन है। हिंदीभाषी स्कूलों में टॉप मेरिट में आने वाले बच्चों को लैपटॉप दिए जाने की व्यवस्था है किंतु संस्कृति स्कूलों से पढ़ कर टॉप करने वाले बच्चों को लैपटॉप दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
 हिंदी भाषी स्कूलों से मेरिट में आने वाले बच्चों को दीनदयाल उपाध्याय पुरस्कार से नवाजा जाता है किंतु संस्कृत शिक्षा से टॉप करने वाले बच्चों को यह पुरस्कार दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
 हिंदी भाषा स्कूलों में छात्रों के टॉप करने पर उनकी माताओं को भी कमला नेहरू पुरस्कार दिया जाता है किंतु संस्कृत शिक्षा के छात्रों के टॉप करने वाले छात्रों की माताओं के लिए ऐसे पुरस्कार के विषय में सरकार सुनने को राजी ही नहीं है।
 यही नहीं हिंदी के जिन वित्तपोषित स्कूलों का शतप्रतिशत परीक्षाफल रहता है उन स्कूलों  को नगद धनराशि, भवन तथा लाइब्रेरी आदि की सुविधा सरकार प्रोत्साहन स्वरूप देती है। किंतु संस्कृत शिक्षा के लिए सरकार ऐसी कोई प्रोत्साहन नहीं दे रही।
 संस्कृत शिक्षा से संचालित विद्यालयों को यह उम्मीद थी कि भाजपा की सरकार आने के बाद संभवत: उनके दिन बहुरेंगे किंतु 6 महीने बीतने के बाद भी संस्कृत शिक्षा के छात्र और उनके अध्यापक मायूस हैं। उन्हें कोई प्रोत्साहन तो दूर बल्कि उनके साथ हो रहे भेदभाव को समाप्त किए जाने पर भी कोई अफसर या जनप्रतिनिधि कान धरने को राजी नहीं है। अगली कड़ी में पढ़िए कि संस्कृत शिक्षा प्रदान कर रहे अध्यापक हिंदी भाषी स्कूलों के अध्यापकों की तुलना में किस तरह वेतन विसंगति का भी सामना कर रहे हैं!

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