भारी पड़ा आई.ए.एस. लॉबी से पंगा

आईएएस लॉबी के हितों से टकराने का खामियाजा आईटीएस ऑफीसर दीपक कुमार को सचिवालय की विदाई से चुकाना पड़ा। पर्वतजन ब्यूरो आखिरकार आईटीएस अफसर दीपक कुमार को आईएएस लॉबी के पुरजोर विरोध के चलते सचिवालय से विदा होना ही पड़ा। यूं तो सचिवालय में आईएएस सेवा से इतर वन एवं अन्य सेवाओं के कई अफसर […]

आईएएस लॉबी के हितों से टकराने का खामियाजा आईटीएस ऑफीसर दीपक कुमार को सचिवालय की विदाई से चुकाना पड़ा।

पर्वतजन ब्यूरो

आखिरकार आईटीएस अफसर दीपक कुमार को आईएएस लॉबी के पुरजोर विरोध के चलते सचिवालय से विदा होना ही पड़ा। यूं तो सचिवालय में आईएएस सेवा से इतर वन एवं अन्य सेवाओं के कई अफसर कार्यरत हैं, किंतु माना जा रहा है कि दीपक गैरोला की विदाई के पीछे मुद्दा गैर आईएएस से इतर एक बड़े बजट की खरीद से जुड़े हितों का टकराव था।
समाज कल्याण विभाग में ५ करोड़ रुपए में मेधावी छात्रों के लिए लैपटॉप खरीदे जाने थे। इसे समाज कल्याण विभाग की सचिव भूपेंद्र कौर औलख खरीदना चाह रही थी, किंतु ऐन मौके पर डील फाइनल होने के वक्त इस खरीद का जिम्मा आईटी विभाग को सौंप दिया गया। इससे समाज कल्याण सचिव और आईटी सचिव में ठन गई।
इसी दौरान गैरोला की प्रतिनियुक्ति अवधि का एक्सटेंशन मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास लंबित पड़ा था। आईएएस अधिकारियों ने गैरोला को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का पसंदीदा अफसर बताते हुए लैपटॉप की खरीद को मुद्दा बनाकर मुख्यमंत्री को राजी कर लिया कि वह गैरोला को रिलीव कर दें। इस तरह त्रिवेंद्र रावत ने गैरोला की रुखसती के फरमान पर हस्ताक्षर कर दिए। अब समाज कल्याण सचिव को फिर से आस जगी है कि लैपटॉप की खरीद के उनके अरमान पूरे हो सकेंगे।
गैरोला की विदाई की वजह बने लैपटॉप खरीद के प्रकरण की थोड़ा पड़ताल करने पर इसकी तह में छुपे लालच और गलतफहमियों का खुलासा कम दिलचस्प नहीं है।
उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की लैपटॉप वितरण योजना से प्रभावित होकर उत्तराखंड के निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी दिसंबर २०१४ में लैपटॉप वितरण की घोषणा की थी। मुख्यमंत्री ने लैपटॉप खरीद के लिए समाज कल्याण विभाग को ५ करोड़ की लागत से लैपटॉप की खरीद के निर्देश दिए थे, किंतु समाज कल्याण विभाग जब छह माह तक भी खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में असमर्थ रहा तो जुलाई २०१५ में मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्कालीन मुख्य सचिव एन रविशंकर, अपर मुख्य सचिव राकेश शर्मा और समाज कल्याण के प्रमुख सचिव एस. राजू के नेतृत्व में हाईपावर कमेटी बनाई गई। इस कमेटी ने यह तय किया कि लैपटॉप खरीद की जिम्मेदारी विशेषज्ञ विभाग आईटी विभाग को सौंप दी जाए।
आईटी सचिव दीपक गैरोला ने तत्काल इसके लिए पांच बैठकों के दौर के बाद खरीद की तात्कालिकता और विश्वसनीयता को देखते हुए जेम (गवर्नमेंट ई मार्केट प्लेस) के पोर्टल से लैपटॉप खरीदने की स्वीकृति दे दी, जेम के खरीदने की मंजूरी मांगने से लेकर खरीद की पूरी कार्रवाई आईटीडीए के निदेशक ने की। जब दीपक गैरोला ने आईटीडीए से सवाल किया कि जेम पोर्टल के माध्यम से क्यों खरीदा गया तो उनका कहना था कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभाग भी जेम से खरीददारी करते हैं। खरीद में गैरोला की भागीदारी तक न थी।
पर्वतजन ने अपने स्तर से इसकी सत्यता जाननी चाही तो पता चला कि लैपटॉप खरीद की स्वीकृति दिए जाने तक केंद्र सरकार के विभिन्न विभाग जेम पोर्टल से ४०० मर्तबा करोड़ों रुपए की खरीददारी कर चुके थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पारदर्शी पक्रिया के तहत ही जेम से खरीददारी को प्राथमिकता दी जा रही थी।
अब उत्तराखंड में जैम के माध्यम से लैपटॉप की खरीददारी पर सवाल उठा रहे अफसरों की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है कि जब सचिवालय में और विभिन्न निदेशालयों में कंप्यूटर, स्केनर, सर्वर और वीडियोवाल की खरीददारी देहरादून की विभिन्न दुकानों से मार्केट रेट से तीन गुना अधिक दरों पर की गई थी, तब तो यही आईएएस खरीद की मंजूरी देने वालों में शामिल थे। फिर केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा खरीद के लिए अधिकृत पोर्टल से लैपटॉप की खरीद पर सवाल क्यों खड़े किए गए।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जिस तरह दो शेरों की लड़ाई में गीदड़ों की बन आती है, उसी तरह से सचिवालय के कुछ अफसरों ने मीडिया जगत के कुछ पत्रकारों को पुचकार करके इस मामले में फेवर के लिए अनुरोध किया। पत्रकारों को भी आईएएस को ओबलाइज करने का यह बढिय़ा मौका लगा और उन्होंने भी मीडिया मीडिया में जेम की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए!
यह माहौल मीडिया में बनाया गया कि इंडियन टेलीकॉम सर्विस के अफसर दीपक गैरोला हरीश रावत के चहेते थे। उन्हें आईटी सचिव की जिम्मेदारी दी गई थी। आईएएस वैसे ही उनका कहना मानने में अपनी तौहीन समझते थे।
निर्णायक लड़ाई लैपटॉप की खरीद को लेकर शुरू हुई। यह लैपटॉप समाज कल्याण विभाग की ओर से चिन्हित छात्रों को आवंटित किए जाने थे। पहले तो समाज कल्याण सचिव भूपेंद्र कौर औलख मैडम इन्हें खुद ही अपनी चहेती कंपनी से खरीदना चाह रही थी। उन्होंने शायद ‘काफी आगे तकÓ की तैयारी भी कर ली थी। बाकायदा खरीद के लिए कमेटी बनाकर एक लैपटॉप बनाने सप्लाई करने वाली प्राइवेट कंपनी ‘सी-डेकÓ को भी कमेटी में सदस्य बना लिया गया था। कंप्यूटर खरीद के लिए बनाई गई कमेटी में एक उससे जुड़ी प्राइवेट कंपनी को क्यों सदस्य बनाया गया होगा, पाठक आसानी से अनुमान लगा सकते हैं।
बहरहाल, लैपटॉप खरीद की इस प्रक्रिया के बीच में मैडम को छुट्टी जाना पड़ा। ऐसे में चार्ज में समाज कल्याण विभाग देख रहे एक और आईएएस लैपटॉप में संभावना देख स्वत: ही चार्ज हो गए। उन्होंने मैडम के वापस लौटने तक किसी दूसरी कंपनी से बात कर ली। अब मामला उलझ गया। इस उलझन का नुकसान यह हुआ कि मुख्यमंत्री कार्यालय से तय हुआ कि लैपटॉप आईटी विभाग खरीदेगा। संभवत: तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री सुरेंद्र राकेश की मृत्यु के बाद कुछ समय यह विभाग मुख्यमंत्री के ही पास था। अब आपसी झगड़े लैपटॉप खरीद की जिम्मेदारी एक आईटीएस के पास जाती देख दोनों आईएएस एक हो गए और आईटीएस गैरोला की तो समझो शामत आ गई।
सीएम ने जैसे ही समाज कल्याण मंत्रालय तत्कालीन कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी को सौंपा, समाज कल्याण सचिव ने विभागीय मंत्री से यह शासनादेश करा दिया कि लैपटॉप आईटी विभाग नहीं, बल्कि समाज कल्याण विभाग ही खरीदेगा। जब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को पता चला तो उन्होंने फिर से यह जिम्मा दिसंबर २०१६ में आईटीडीए के डायरेक्टर धर्मेंद्र सिंह को दे दिया। इस खरीद के मामले में सचिव दीपक गैरोला की कोई भूमिका भी नहीं थी।
५ करोड़ की लैपटॉप खरीद का मौका हाथ से निकलते देख इस खरीद को मीडिया में एक घोटाले की तरह प्लांट कर दिया गया, किंतु पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने स्पष्ट निर्देश कर दिए थे कि खरीद जारी रहनी चाहिए। हालांकि इस बीच आचार संहिता लागू हो जाने के कारण खरीद की प्रक्रिया रुक गई, किंतु खरीद को करने के इच्छुक आईएएस नाराज हो गए। कुछ आईएएस लैपटॉप के मामले को लेकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत से मिले और दीपक गैरोला की प्रतिनियुक्ति अवधि लंबित होने और गैरोला को हरीश रावत का चहेता बताते हुए उन्हें रिलीव कराने में सफल हो गए।
हरीश रावत से नजदीकी की पड़ताल की गई तो साफ हो गया कि दीपक गैरोला को तो प्रतिनियुक्ति पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने कार्यकाल में ही ला चुके थे। बल्कि हरीश रावत ने तो मुख्यमंत्री बनने के पूरे नौ माह तक दीपक गैरोला को कोई विभाग तक आवंटित नहीं किए थे। उत्तराखंड के चमोली जिले के रहने वाले गैरोला उत्तराखंड में सेवा करने की इच्छा से यहां आए थे, किंतु आईएएस लॉबी के चक्रव्यूह में फंस कर रह गए। ऊपर से अपनी छवि को भी खराब कर बैठे।
आखिर बेचारे आईटीएस अफसर दीपक गैरोला को सचिवालय से ऐसे बाहर फिंकवा दिया गया, जैसे मधुमक्खियां अपने छत्ते से किसी बाहरी कीट पतंगों को बाहर फेंक देती हैं।
बहरहाल, दीपक गैरोला तो रुखसत हो गए, किंतु यह देखना दिलचस्प रहेगा कि अब लैपटॉप खरीद के खेल में किस तरह का खेल होता है।

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