विभागीय अधिकारियों की लापरवाही से जखोली लस्तर नहर बन्द

  • जगदम्बा कोठारी/रुद्रप्रयाग

रूद्रप्रयाग जनपद के विकासखंड जखोली में निर्मित ऐतिहासिक जखोली लस्तर नहर आज विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के चलते बन्द पड़ी है, जिसका खामियाजा दर्जनों गांव के किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
सन् 1979 मे तत्कालीन विधायक कामरेड विद्दासागर नौटियाल (तब रूद्रप्रयाग देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र मे था) ने जखोली की लस्तर नदी में वर्ष भर पर्याप्त पानी को देखते हुए इस नहर निर्माण को वित्तीय स्वीकृति प्रदान की थी। तब की एक करोड़ रुपये लागत से इस सिंचाई नहर का निर्माण सिंचाई विभाग द्वारा शुरू किया गया। लगभग पाँच वर्ष से अधिक समय इस नहर का निर्माण मे लगा।
लस्तर नहर का उद्देश्य बांगर पट्टी और लस्या पट्टी के दो दर्जन से अधिक गाँवों की सैकड़ों हैक्टेयर कृषि भूमि को वर्ष भर सिंचाई उपलब्ध कराना था।
वर्षों तक नहर निर्माण होने के बाद सन् 1985 तक नहर सिंचाई उपलब्ध कराने के लिए तैयार थी। जनपद के सीमांत गांव सिरवाडी बा़ांगर से एक किलोमीटर ऊपर लस्तर नदी के मुख्य स्रोत से लेकर लस्या पट्टी के जखोली मुख्यालय तक 29 किलोमीटर लंबी इस नहर का निर्माण किया गया। बाद मे 3 किलोमीटर और नहर विस्तारीकरण कर नहर को बजीरा गाँव तक पहुँचाया गया। दुर्गम व विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों मे नहर को कई सुरंगों से निकालकर इसका निर्माण किया गया।
लेकिन अब विभागीय उदासीनता के चलते यह सिंचाई नहर पानी की राह देख रही है। लस्तर नदी मे पर्याप्त पानी होने के बावजूद सिंचाई विभाग नहर मे पानी चालू नहीं कर रहा है। जिस कारण बांगर पट्टी के सिरवाडी, गैठांणा, बधाणी, कोट, मुन्यागर सहित लस्या पट्टी के बरसीर, जखोली, कपणियां, बजीरा सहित पौंठी गांव से धान की रोपाई नहीं हो सकी है।


स्थानीय काश्तकार विक्रम रौथाण, जयेन्द्र रावत, भुवनेश्वर थपलियाल व प्रगतिशील किसान हयात सिंह राणा सिंचाई विभाग पर आरोप लगाते हैं कि लस्तर नहर ही दर्जनों गांव की कृषि भूमि मे सिंचाई का एकमात्र विकल्प है। विभाग द्वारा नहर पर पानी न छोडे जाने के कारण अभी तक रोपाई नहीं हो सकी है।
वहीं जब हमने इस मामले में सिंचाई विभाग का पक्ष जानना चाहा तो विभागीय अधिकारियों से संपर्क नही हो सका।
जखोली लस्तर नहर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

यह भारत मे ही नहीं बल्कि एशिया की 32 किलोमीटर सबसे लम्बी नहर है जो कि समुद्र तल से 6500 फीट की ऊँचाई पर निर्मित है।

80 के दशक मे 1 करोड़ की लागत से निर्माण हुआ इस नहर का। पाँच वर्ष से अधिक समय लगा नहर निर्माण में

दर्जनों सुरंग से होकर गुजरती है यह नहर

बांगर, लस्या और सिलगढ पट्टी के दर्जनों गांव की सैकड़ों हैक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होती है इस नहर की

नहर 1 मीटर चौड़ी और एक मीटर ऊँची और 32 किलोमीटर लंबी है।

प्रत्येक वर्ष करोड़ों रुपये नहर की मरम्मत के लिए स्वीकृति प्रदान करता है सिंचाई विभाग लेकिन अब यह ऐतिहासिक सिंचाई नहर बस विभाग के लिए सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी के समान ही रह गयी है।

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