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नेलोंग बार्डर पर गर्तांगली की मरम्मत के लिए पर्यटन विभाग ने जारी किया बजट। पर्यटक स्थल में शुमार होगी चीन सीमा पर गर्तांगली गिरीश गैरोला/उत्तरकाशी उत्तरकाशी से लगी चीन सीमा पर जीर्ण पड़ी गर्तांगली अब पर्यटक स्थल के रूप में विकसित होने जा रही है। 1962 के भारत-चीन युद्ध से पूर्व भारतीय सेना के जवान […]

नेलोंग बार्डर पर गर्तांगली की मरम्मत के लिए पर्यटन विभाग ने जारी किया बजट। पर्यटक स्थल में शुमार होगी चीन सीमा पर गर्तांगली

गिरीश गैरोला/उत्तरकाशी

उत्तरकाशी से लगी चीन सीमा पर जीर्ण पड़ी गर्तांगली अब पर्यटक स्थल के रूप में विकसित होने जा रही है। 1962 के भारत-चीन युद्ध से पूर्व भारतीय सेना के जवान और तिब्बत से भारत आने वाले व्यापारी इसी मार्ग का उपयोग करते रहे हैं। डीएम उत्तरकाशी डा. आशीष कुमार ने बताया कि उस समय की इंजीनियरिंग कौशल का इस नमूने की मरम्मत के लिए पर्यटन विभाग को 26.50 लाख रु. जारी कर दिए गए हैं। कोल्ड डेजर्ट कहा जाने वाला नेलोंग बार्डर एके साथ अब पर्यटक गर्तांगली के भी दीदार कर सकेंगे। साहसिक पर्यटन से लबालब नेलोंग घाटी में मौजूद गर्तांग पर्यटक स्थल के साथ सांस्कृतिक विरासत भी है।
गर्तांगली के दिन अब बहुरने वाले हैं। करीब तीन सौ मीटर लंबे इस मार्ग की मरम्मत के लिए लिए शासन से जिला प्रशासन को 26.50 लाख रुपये की धनराशि मिल गई है। जिलाधिकारी डा. आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि गर्तांगली की मरम्मत का जिम्मा गंगोत्री नेशनल पार्क को दिया गया है। गर्तांग गली गंगोत्री नेशनल पार्क क्षेत्र में आती है।
भारत-चीन युद्ध से पहले व्यापारी इस रास्ते से ऊन, चमड़े से बने वस्त्र व नमक लेकर बाड़ाहाट (उत्तरकाशी का पुराना नाम) पहुंचते थे। चीन से युद्ध के बाद इस मार्ग पर आवाजाही बंद हो गई, लेकिन सेना का आना-जाना जारी रहा। 1975 में सेना ने भी इस रास्ते का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया। 42 साल से मार्ग का रखरखाव न होने से सीढिय़ां क्षतिग्रस्त हो गई हैं। सीढिय़ों के किनारे सुरक्षा के लिए लगी रेलिंग की लकडिय़ां भी खराब हो चुकी हैं।
जिलाधिकारी डा. आशीष श्रीवास्तव, पर्यटन अधिकारी व गंगोत्री नेशनल पार्क के अधिकारियों को संयुक्त रूप से इस मार्ग का स्थलीय निरीक्षण किया था तथा मरम्मत के लिए शासन से धनराशि मांगी थी। जिलाधिकारी डा. आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि जल्द से जल्द मार्ग की मरम्मत कराई जाएगी। इससे इस मार्ग को पर्यटकों के लिए खोला जा सके। इससे पर्यटकों को एहसास हो सके कि कभी किस तरह जोखिम भरे रास्तों से न सिर्फ व्यापार चलता था, बल्कि सेना के जवान और उनका साजोसामान भी घोड़े, खच्चर सहित इसी मार्ग से होकर गुजरता था।

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