देहरादून: जिला शिक्षा अधिकारी (प्रारंभिक शिक्षा), देहरादून ने अनुसूचित जाति (SC) के फर्जी जाति प्रमाण-पत्र के सहारे राजकीय प्राथमिक विद्यालय, जोलीग्रांट प्रथम, विकासखंड-डोईवाला में कार्यरत सहायक अध्यापिका श्रीमती सीमा देवी की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी हैं।

कार्यालय आदेश संख्या 60-1/13 (सेवा समाप्ति/2026-27) दिनांक 07 अप्रैल, 2026 के अनुसार, जिला अधिकारी, टीहरी गढ़वाल के पुराने आदेशों और जनपद स्तरीय कास्ट स्क्रूटनी कमेटी की जांच रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई की गई है।
जांच में पाया गया कि श्रीमती सीमा देवी का जाति प्रमाण-पत्र संख्या-248 (दिनांक 29.06.2005) गलत और अनुसूचित जाति के रूप में अनुचित था। इस प्रमाण-पत्र के आधार पर उन्हें आरक्षण का लाभ मिला था, जिसे अब निरस्त कर दिया गया है।
आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि फर्जी/गलत जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर नियुक्ति प्रारंभ से ही शून्य (अवैध) मानी जाएगी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-311 के तहत भी ऐसे व्यक्ति को संरक्षण का अधिकार नहीं होता।
उत्तराखंड शासन के संबंधित शासनादेशों (जैसे सामाजिक कल्याण अनुभाग-01 का शासनादेश संख्या 1153/2008 और कार्मिक अनुभाग-2 का शासनादेश संख्या 1301/2006) के अनुसार, स्क्रूटनी कमेटी द्वारा असत्य पाए गए प्रमाण-पत्र को तुरंत निरस्त किया जाता है और संबंधित व्यक्ति को बिना नोटिस के सेवा से हटाया जा सकता है।
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श्रीमती सीमा देवी की प्रथम नियुक्ति 10 अगस्त 2013 को जनपद टीहरी गढ़वाल में हुई थी, जिसके बाद 02 अप्रैल 2022 को वे देहरादून के जोलीग्रांट प्रथम स्कूल में स्थानांतरित हुईं।
उनके आवेदन पत्र और चयन प्रक्रिया में गलत जाति प्रमाण-पत्र का उपयोग पाया गया, जिसके चलते उनकी नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया गया है।

जिला शिक्षा अधिकारी (प्रा.शि.) प्रेमलाल भारती द्वारा हस्ताक्षरित इस आदेश में कहा गया है कि फर्जी प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी पाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है, ताकि वास्तविक आरक्षण लाभार्थियों को न्याय मिल सके।यह कार्रवाई स्थानीय शिकायतकर्ता नरेश बौंठियाल की शिकायत पर हुई है।
यह घटना उत्तराखंड में फर्जी जाति/निवास प्रमाण-पत्रों के आधार पर सरकारी नौकरियों में घुसपैठ के मामलों को लेकर चल रही व्यापक जांच का हिस्सा मानी जा रही है।


शिक्षा विभाग ने ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए कई शिक्षकों की सेवाएं पहले भी समाप्त की हैं।
सरकारी एजेंसियां लगातार इसे बचा रही थीं, जिसके बावजूद शिकायतकर्ता की निरंतर प्रयासों से अंततः जांच पूरी हुई और कार्रवाई संभव हो सकी।
ऐसी कार्रवाइयां वास्तविक SC/ST/OBC उम्मीदवारों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी हैं, क्योंकि फर्जी प्रमाण-पत्र न केवल योग्य व्यक्तियों का अधिकार छीनते हैं बल्कि पूरे आरक्षण व्यवस्था पर सवाल भी खड़े करते हैं।




