- धारी ताल्ली में डेढ़ साल से बंद पड़ी कृषि मंडी, 16 दुकानें बनीं शोपीस; बिचौलियों के भरोसे स्योरी फल पट्टी के काश्तकार
नौगांव/उत्तरकाशी।नीरज उत्तराखंडी
रवांई घाटी की स्योरी फल पट्टी के काश्तकारों को इस वर्ष भी करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से धारी ताल्ली में तैयार की गई कृषि उत्पादन मंडी समिति का लाभ नहीं मिल पाया। मंडी का निर्माण पूरा हुए करीब डेढ़ वर्ष बीत चुका है, लेकिन अब तक इसका संचालन शुरू नहीं हो सका है। परिसर में निर्मित 16 दुकानें भी उपयोग के इंतजार में शोपीस बनी हुई हैं।
रवांई चाटी में सेब, टमाटर, आलू, मटर, फ्रेंचबीन समेत विभिन्न नगदी फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर प्रभावी विपणन व्यवस्था नहीं होने के कारण किसानों को अपनी उपज बाहरी मंडियों तक पहुंचाने के लिए बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे एक ओर किसानों की परिवहन लागत बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर उन्हें अपनी उपज का अपेक्षित मूल्य नहीं मिल पाता।
मंडी शुरू होने की उम्मीद फिर टूटी
इस वर्ष काश्तकारों को उम्मीद थी कि धारी ताल्ली मंडी का संचालन शुरू होने से उन्हें स्थानीय स्तर पर ही बाजार उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन सीजन बीतने के बावजूद मंडी शुरू नहीं हो सकी। इससे किसानों में निराशा है।
स्थानीय कांग्रेस नेता एवं पूर्व सचिव मरदार सिंह राणा ने आरोप लगाया कि मंडी के संचालन में हो रही देरी का सीधा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। उनका कहना है कि उचित बाजार और दाम नहीं मिलने के कारण इस वर्ष 50 प्रतिशत से अधिक टमाटर की तुड़ाई नहीं हो सकी, जिससे बड़ी मात्रा में फसल खेतों में ही खराब हो गई। वहीं सेब की फसल को भी किसानों को बाहरी मंडियों में भेजना पड़ा।
मंडी संचालन में देरी को लेकर स्थानीय भाजपा नेताओं की चुप्पी पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। क्षेत्रवासियों का कहना है कि सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर मंडी का ढांचा तो तैयार कर दिया, लेकिन किसानों को उसका वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए आवश्यक संचालन प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं की गई।
सवाल यह कि जब मंडी तैयार है तो संचालन क्यों नहीं?
किसानों का कहना है कि मंडी का उद्देश्य ही स्थानीय उत्पादकों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना और बिचौलियों पर उनकी निर्भरता कम करना है। ऐसे में यदि निर्माण पूरा होने के बाद भी मंडी बंद पड़ी है तो सरकारी निवेश का वास्तविक लाभ किसानों तक कैसे पहुंचेगा, यह बड़ा सवाल है।
क्षेत्रवासियों ने मंडी का संचालन तत्काल शुरू करने और किसानों की उपज के लिए स्थानीय स्तर पर व्यवस्थित बाजार उपलब्ध कराने की मांग की है।
सड़क के अभाव में खेत से बाजार तक नहीं पहुंच पा रही नकदी फसल
2015-16 में शासनादेश के बावजूद 4.5 किमी श्रीपुर-त्यारखा-धौलागिरी मोटर मार्ग अधूरा; 800 से अधिक आबादी आज भी पैदल दूरी तय करने को मजबूर
वहीं जौनपुर विकासखंड की सकलाना पट्टी में श्रीपुर-त्यारखा-धौलागिरी मोटर मार्ग का निर्माण शासनादेश जारी होने के करीब एक दशक बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। सड़क सुविधा के अभाव में ग्रामीणों को आज भी पैदल दूरी तय कर अपनी नकदी फसलें सड़क तक पहुंचानी पड़ रही हैं। इससे किसानों का समय और श्रम दोनों खर्च हो रहे हैं।
जौनपुर के ज्येष्ठ प्रमुख जयकृष्ण उनियाल के अनुसार श्रीपुर-त्यारखा-धौलागिरी मोटर मार्ग की मांग ग्रामीण लंबे समय से करते आ रहे हैं। वर्ष 2015-16 में सड़क निर्माण का शासनादेश भी जारी हुआ था, लेकिन इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग करीब 4.5 किलोमीटर सड़क का निर्माण पूरा नहीं कर पाया है।
उनका कहना है कि सड़क पूरी नहीं होने के कारण ग्रामीणों को करीब साढ़े तीन किलोमीटर तक पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। विशेष रूप से कृषि उपज को सड़क तक पहुंचाना किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
अदरक से लेकर आलू तक उगाते हैं किसान
सकलाना पट्टी के काश्तकार अदरक, अरबी, बीम, चौलाई, लहसुन, मटर और आलू समेत कई नकदी फसलों का उत्पादन करते हैं। लेकिन मोटर मार्ग नहीं होने से खेतों में तैयार उपज को खराब और दुर्गम रास्तों से सड़क तक पहुंचाना पड़ता है।
किसानों के लिए समस्या केवल उपज को सड़क तक पहुंचाने तक सीमित नहीं है। पैदल ढुलाई के कारण लागत बढ़ती है और समय पर बाजार तक फसल नहीं पहुंच पाने से उसके खराब होने का खतरा भी बना रहता है। ऐसे में सड़क सुविधा का सीधा संबंध ग्रामीणों की कृषि आय से जुड़ा हुआ है।
बच्चों को भी जंगल के रास्ते जाना पड़ता है स्कूल
ज्येष्ठ प्रमुख जयकृष्ण उनियाल ने बताया कि सड़क सुविधा से वंचित रावणगांव, त्यारा और धौलागिरी गांवों की 800 से अधिक आबादी लंबे समय से सड़क का इंतजार कर रही है। ग्रामीणों के बच्चों को भी स्कूल जाने के लिए कई किलोमीटर जंगल के रास्ते पैदल चलना पड़ता है। इस दौरान उन्हें जंगली जानवरों का भय भी बना रहता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क का निर्माण पूरा हो जाए तो न केवल कृषि उपज को बाजार तक पहुंचाना आसान होगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की आवाजाही की समस्या भी काफी हद तक कम हो सकती है।
दो जगह एक ही सवाल—ढांचा और शासनादेश काफी नहीं
उत्तरकाशी में करोड़ों की लागत से मंडी का निर्माण होने के बावजूद उसका संचालन नहीं होना और टिहरी के जौनपुर क्षेत्र में वर्षों पुराने शासनादेश के बावजूद सड़क अधूरी रहना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक समान समस्या की ओर इशारा करता है—सरकारी योजना या निर्माण तभी सार्थक है, जब उसका वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
एक तरफ किसान बाजार के अभाव में उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सड़क के अभाव में खेत से बाजार तक पहुंचना ही चुनौती बना हुआ है। अब जरूरत केवल घोषणाओं और निर्माण कार्यों की नहीं, बल्कि मंडी संचालन और सड़क निर्माण को समयबद्ध तरीके से पूरा कर किसानों को वास्तविक सुविधा देने की है।


