एक्सक्लूसिव : मौसम में बदलाव दे रहा खेती किसानी को गहरे घाव

पुरोला ।  (नीरज उत्तराखंडी )   मून व मंगल पर मिशन की गाथा लिखने वाला आधुनिक  मानव मौसम की मेहरबानी को तरस रहा है। मौसम की बेरूखी खेती किसानी, बागवनी सहित पर्यटन पशु पालन और पानी  संकट के संकेत दे रही है। मौसम में बदलाव खेती किसानी को गहरे घाव दे रहा है । माघ […]

पुरोला । 

(नीरज उत्तराखंडी )

 

मून व मंगल पर मिशन की गाथा लिखने वाला आधुनिक 

मानव मौसम की मेहरबानी को तरस रहा है। मौसम की बेरूखी खेती किसानी, बागवनी सहित पर्यटन पशु पालन और पानी  संकट के संकेत दे रही है।

मौसम में बदलाव खेती किसानी को गहरे घाव दे रहा है ।

माघ मास में अक्सर बर्फ की सफेद चादर ओढ़ने वाले पहाड़ की चोटियां धुंध व धुंए से ढकी हैं । बर्फ से लकदक रहने वाली पेड़ों  की टहनियां धूल धुसरित हैं । पानी की जलधाराओं में पाले के जमने से बनने वाली कोतुहलपूर्ण आकृतियाँ देखने को  नौनिहालों की आंखें  तरस रही है । बर्फ से आकृतियाँ बनाने बर्फ के गोले बनाकर एक दूसरे पर फेंक कर मनोरंजन करने  खेलने  को नौनिहाल तरस रहे है। 

पर्यटकों को आकर्षित  करने वाला पहाड़ का मनोरम नजारा मौसम की बेरूखी के चलते नदारद है। कृषि  बागवानी  के लिए  संजीवनी का काम करने वाली बर्फ बारी न होने से खेती किसानी की बर्बादी की इबारत लिख रही है। पर्यटन व जल स्रोतों को जीवन देने वाली वर्षा व बर्फ मौसम में  बदलाव होने से गहरे घाव दे रहे हैं ।

लेकिन मौसम हैं कि  बरस नहीं रहा है। सेब के पौधों को जो न्यूनतम  तापमान की जरूरत होती है व हिमपात  न होने से न मिल पाने से बागवनी पर संकट के संकेत हैं । बारिश व बर्फबारी के इंतजार में  किसानों व बागवानों की आंखें पथरा गई है । समय  पर वर्षा व बर्फ न गिरने पर पर्यटन कृषि  पशु पालन पानी पर्यावरण पर गहरे  संकट के संकेत हैं । जल स्रोतों को जीवन न मिलने  से आने वाले महीनों में भीषण जल संकट के साथ ही पशुओं के लिए चारा की मुसीबत का सबब है ।

मौसम में बदलाव के चलते पहाड़ में चटक धूप खिलने की बजाय धुंध व धुंए का पहरा है।  पेड़ों की चमकीली  शाखाओं एवं पत्तियों पर धुल  की मोटी परत जम गई है। हवाओं में जहर घुल गया हैं । शीतल मंद हवाएं में तीर सी चुभन है ।  पहाड़ों में हाड़ कपाने वाली खुशक सर्दी का डेरा है। 

अक्सर तरोताजा रहने वाला इंसान  मौसमी बीमारी से ग्रस्त है। ।बहरहाल 21वीं सदी का मानव प्रकृति के आगे असहाय नजर आ रहा है। इन सब परिस्थितियों के लिए आधुनिक कहलाने वाले मानव की भूमिका महत्वपूर्ण है । प्रकृति से अनावश्यक छेड़ छाड़ कर अनियोजित  विकास , जंगलों को काटकर ईट की इमारतों  का जंगल खड़ा कर,  विपुल मात्रा में

जहरीली गैस व धुंए के गुब्बार आकाश में भेजने,असंख्य मात्रा में  वृक्षों का कटान, वन को आग के हवाले करने जैसे  कुकृत्य पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने का ही यह प्रतिफल है।

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