त्यूणी। देहरादून।3 नवंबर 2026,नीरज उत्तराखंडी
सीमांत तहसील त्यूणी के किसानों और बागवानों के लिए फसल बीमा पिछले पांच वर्षों में राहत के साथ-साथ विवाद का विषय भी बना रहा है।
सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि देहरादून जिले में मौसम आधारित फसल बीमा योजना के तहत बड़े पैमाने पर किसान और बागवानी फसलें कवर हुईं, वहीं त्यूणी क्षेत्र में क्लेम भुगतान में देरी, CSC के माध्यम से कथित फर्जी बीमा और करीब ₹55 लाख के कथित निजी बीमा विवाद जैसे मामले सामने आए हैं। हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों से अभी किसी एक संगठित “बीमा घोटाले” का अंतिम प्रमाण नहीं मिलता।
देहरादून क्लस्टर में AIC की जिम्मेदारी
12 सितंबर 2023 के उत्तराखंड हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार RWBCIS के क्लस्टर-3 में देहरादून, हरिद्वार और टिहरी को रखा गया था। वर्ष 2023 के कार्यादेश के तहत इस क्लस्टर के लिए Agriculture Insurance Company of India (AIC) को योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी दी गई थी। इसका मतलब है कि 2023-24 और 2024-25 में त्यूणी के सरकारी RWBCIS दावों की जांच में AIC और उद्यान विभाग के रिकॉर्ड निर्णायक होंगे।
देहरादून में करोड़ों की बीमित राशि
उद्यान विभाग के आधिकारिक आंकड़ों में देहरादून जिले के लिए फसलवार किसान, क्षेत्र/पेड़, बीमित राशि, किसान प्रीमियम, सरकारी सब्सिडी और क्लेम का विवरण दर्ज है। 2021 खरीफ में ही अदरक, अदरक-हिल्स, टमाटर, आलू, मिर्च और फ्रेंचबीन जैसी फसलों में हजारों किसान बीमित रहे। रबी में सेब, आड़ू, माल्टा, संतरा, आम, मटर समेत अनेक बागवानी फसलें भी योजना में शामिल रहीं।
2024-25 के भुगतान को लेकर किसानों का आक्रोश
त्यूणी के किसानों ने नवंबर 2025 में 2024-25 की फसल क्षति के बाद बीमा भुगतान की मांग उठाई। शिकायत में सेब, आड़ू, पलम, चुल्लू, नाशपाती, खुबानी, आम, संतरा, नींबू और टमाटर जैसी फसलों का उल्लेख किया गया। विभागीय स्तर पर मौसम संबंधी आंकड़े एकत्र कर रिपोर्ट सरकार को भेजे जाने तथा भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात सामने आई। जनवरी 2026 में भी सेब उत्पादकों ने भुगतान न मिलने पर आंदोलन की चेतावनी दी।
CSC पर ₹1.68 लाख लेने का आरोप
फरवरी 2025 में त्यूणी पुलिस ने CSC संचालक मनीष क्षेत्री के खिलाफ कथित फर्जी कृषि बीमा के मामले में मुकदमा दर्ज किया। भागवत गांव के किसान प्रताप सिंह ने आरोप लगाया कि 2023 से 2025 के बीच बीमा के लिए उनसे ₹1,68,900 लिए गए, लेकिन बाद में बीमा नहीं होने की जानकारी मिली और कथित रूप से गलत/संपादित रसीदें दी गईं। पुलिस के अनुसार अन्य किसानों की शिकायतें भी सामने आई थीं। मामले में शिकायतकर्ता द्वारा बताए गए संभावित ₹13.29 लाख के क्लेम को वास्तविक बीमा देयता नहीं माना जा सकता; इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
₹55 लाख के निजी बीमा का रहस्य
दिसंबर 2025 में त्यूणी क्षेत्र के बागवानों ने उद्यान निदेशक को ज्ञापन देकर आरोप लगाया कि एक निजी बीमा कंपनी ने आड़ू, पलम और खुबानी का बीमा कर करीब ₹55 लाख प्रीमियम लिया, लेकिन फसल नुकसान के बाद क्लेम नहीं दिया। किसानों ने नुकसान के प्रमाण जमा करने की बात कही।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह बीमा सरकारी RWBCIS था या अलग निजी वाणिज्यिक बीमा। उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों में अभी कंपनी का नाम, पॉलिसी नंबर, कुल बीमित क्षेत्र और क्लेम अस्वीकृति का मूल पत्र सामने नहीं आया है। इसलिए इसे सरकारी बीमा घोटाला कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
मौसम आंकड़े होंगे असली कसौटी
RWBCIS मौसम सूचकांक आधारित योजना है। इसमें निर्धारित Reference Unit Area में दर्ज मौसम आंकड़ों को Term Sheet में निर्धारित Trigger और Exit से मिलाकर क्लेम तय किया जाता है। त्यूणी में वर्ष 2015 से Automatic Weather Station स्थापित होने का सरकारी दस्तावेजी उल्लेख भी मिलता है। लेकिन यह अभी प्रमाणित नहीं है कि 2024-25 के RWBCIS क्लेम की गणना में उसी स्टेशन का डेटा इस्तेमाल हुआ था।
यही अब जांच का सबसे अहम बिंदु है—त्यूणी के लिए निर्धारित Reference Unit Area कौन था, संबंधित मौसम केंद्र कौन-सा था, 2024-25 में वहां वास्तविक मौसम आंकड़े क्या रहे और उन आंकड़ों के आधार पर AIC ने कितने दावों की गणना की।
दस्तावेजों से उठते पांच बड़े सवाल
- पहला, 2021-22 से 2025-26 तक त्यूणी में गांववार कितने किसान बीमित हुए?
- दूसरा, किसानों से कितना प्रीमियम और सरकार से कितनी सब्सिडी जमा हुई?
- तीसरा, कितने क्लेम स्वीकृत, भुगतान, लंबित अथवा अस्वीकृत हुए?
- चौथा, CSC मामले में कुल कितने किसान और कितनी रकम प्रभावित हुई?
- पांचवां, करीब ₹55 लाख वाले निजी बीमा की वास्तविक कंपनी, पॉलिसी और भुगतान-देयता क्या है?
अब तक की पड़ताल यह संकेत जरूर देती है कि त्यूणी में फसल बीमा व्यवस्था के सामने भुगतान में देरी, प्रशासनिक अड़चन और कथित फर्जी नामांकन जैसी गंभीर समस्याएं रही हैं। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किसी एक बड़े “बीमा घोटाले” का निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा।
बहरहाल गांववार पॉलिसी रिकॉर्ड, प्रीमियम-सब्सिडी विवरण, Term Sheet, मौसम केंद्र के प्रमाणित आंकड़े और किसानवार क्लेम स्टेटमेंट ही तय करेंगे कि समस्या बीमा कंपनी की थी, सरकारी सब्सिडी की, मौसम डेटा की, निजी बीमा की अथवा CSC स्तर के कथित फर्जीवाड़े की।






