नौगांव, यमुना घाटी/उत्तरकाशी,1 नवंबर 2026
रिपोर्ट – नीरज उत्तराखंडी
- किसान परिवार की बेटी ने राष्ट्रीय स्तर पर जीते दो स्वर्ण पदक, अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराने का लक्ष्य
उत्तरकाशी। भाटिया गांव की पगडंडियों से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर दो स्वर्ण पदक जीतने वाली मीनाक्षी रावत की कहानी सिर्फ खेल उपलब्धि की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन और सपनों को हकीकत में बदलने की जिद की प्रेरक गाथा है।
किसान माता-पिता की बेटी मीनाक्षी ने सीमित संसाधनों के बीच अपने भीतर के खिलाड़ी को पहचाना और लगातार मेहनत के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उनके इस सफर में परिवार का सहयोग, भाई-बहनों का साथ और एक वर्दीधारी महिला कर्मी के रूप में अनुशासन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मीनाक्षी की सफलता यह संदेश देती है कि प्रतिभा सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत निरंतर हो और कदम मंजिल की ओर बढ़ते रहें तो पहाड़ की कठिन पगडंडियां भी सफलता की राह बन सकती हैं।
राष्ट्रीय प्रतियोगिता में दो स्वर्ण पदक जीतकर मीनाक्षी ने उत्तरकाशी और पूरे उत्तराखंड का गौरव बढ़ाया है। लेकिन उनके लिए यह मंजिल नहीं, बल्कि आगे की यात्रा का पड़ाव है। अब नजर अंतरराष्ट्रीय मंच पर है, जहां वह देश का प्रतिनिधित्व करते हुए तिरंगा ऊंचा उठाने का सपना संजोए हैं।
मंजिल अभी बाकी है…
मीनाक्षी ने केवल खेल की सीढ़ियां नहीं चढ़ीं, बल्कि हर कदम के साथ अपने सपनों को नई ऊंचाई दी है। उनके गले में चमकते दो स्वर्ण पदक उन संघर्षों की गवाही हैं, जिन्हें उन्होंने चुपचाप पार किया है।
भाटिया गांव की इस बेटी ने साबित कर दिया है कि सपनों की उड़ान के लिए बड़े शहरों का आसमान जरूरी नहीं, हौसलों का ऊंचा होना जरूरी है।
आज मीनाक्षी राष्ट्रीय विजेता हैं, कल अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरव बनने की बारी है। मंजिल अभी बाकी है… और सफर जारी है।






