सियासी तूफान थमा लेकिन साख तो गई, त्रिवेंद्र!

रिपोर्ट /गुणानंद जखमोला पहले ही नहीं सुनते थे अफसर, अब हो जाएंगे बेलगाम एक-एक दिन काटना पड़ेगा भारी, डैमेज कंट्रोल होना आसान नहीं गैरसैंण में बजट सत्र की बात क्या भाजपा हाईकमान को नहीं पता थी? फिर रमन सिंह को ऑब्जर्वर बना कर क्यों भेजा गया? यदि साधारण बात थी तो सत्र से पहले या […]

रिपोर्ट /गुणानंद जखमोला

  • पहले ही नहीं सुनते थे अफसर, अब हो जाएंगे बेलगाम
  • एक-एक दिन काटना पड़ेगा भारी, डैमेज कंट्रोल होना आसान नहीं

गैरसैंण में बजट सत्र की बात क्या भाजपा हाईकमान को नहीं पता थी? फिर रमन सिंह को ऑब्जर्वर बना कर क्यों भेजा गया? यदि साधारण बात थी तो सत्र से पहले या सत्र के बाद देहरादून आया जा सकता था। दिन भर की धमा-चैकड़ी रही। सियासी तूफान रहा और बाद में कह दिया गया कि चार साल के जश्न की तैयारी थी।

 क्या जनता मूर्ख है, जो  ऑब्जर्वर का अर्थ नहीं समझती? क्या ये कांग्रेस की चाल थी? या केजरीवाल ने रमन सिंह को भेजा। स्पष्ट है कि भाजपा ने ही भेजा। अपनों ने ही त्रिवेंद्र की उस इमेज को फिर धूमिल कर दिया जो वो कुछ दिनों से सुधारने में जुटे हुए थे। फिसड्डी सीएम का तमगा मिलने से पहले ही उनको डैमेज कर दिया गया था।  

त्रिवेंद्र को फिसड्डी सीएम घोषित करवाने के पीछे भी भाजपा की यही लॉबी रही होगी। बड़ी मुश्किल से त्रिवेंद्र की इमेज की खरोंचें पोतनी शुरू हुई थी कि अब नया बखेड़ा खड़ा हो गया। उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश में संदेश चला गया कि सीएम बदला जाएगा। यानी त्रिवेंद्र की लुटिया डुबोने में भाजपाई ही जुटे हुए है। राजनीतिक हलकों में त्रिवेंद्र को एक बहुत ही कमजोर मुख्यमंत्री माना जाता है। भले ही उनके चार साल का कार्यकाल पूरा होने जा रहा हो, लेकिन आज तक त्रिवेंद्र की इमेज बिल्डिंग भाजपाइयों ने ही नहीं होने दी। 

त्रिवेंद्र के राज में नौकरशाह पहले ही उनको गंभीर नहीं लेते थे। कोई भी नौकरशाह सीएम या मंत्रियों की सुनता ही नहीं। राज्य मंत्री रेखा आर्य को नौकरशाहों ने सबक सिखा दिया तो सीएम की बात को नौकरशाह कितनी गंभीरता से लेते हैं, इसका एक उदाहरण उत्तराखंड भेड़ एवं ऊन विकास निगम से लिया जा सकता है। पार्टी की सीनियर नेता मेनका गांधी के आरोप के बाद त्रिवेंद्र ने 11 जनवरी को जांच के आदेश दिये। प्रमुख सचिव मनीषा पंवार को 15 दिन में रिपोर्ट देने को कहा।

 एक दिन बाद ही यह जांच प्रमुख सचिव आनंद वर्धन को सौंप दी गई। पूरे दो महीने बीत गये अब राज्यमंत्री रेखा आर्य ने कहा कि एसआईटी जांच करेगी। सचिव स्तर के घोटाले की जांच एसआईटी करेगी। यह ठीक ऐसे है जैसे अमनमणि त्रिपाठी प्रकरण में तत्कालीन अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश की जांच एक सब इंस्पेक्टर को सौंप दी गयी। जो संभवत: कभी पूरी होगी भी नहीं। 

बहरहाल, राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि त्रिवेंद्र के लिए निकट भविष्य में मुसीबतें और अधिक बढ़ेगी। उनके लिए इतना बड़ा डैमेज कंट्रोल करना आसान नहीं होगा। वह भी तब जब भाजपा का एक बड़ा और शक्तिशाली गुट उनका राजनीतिक करियर चौपट करने पर तुला हुआ है। अगले कुछ महीनों में चुनावी सरगर्मी शुरू हो जाएगी तो भला त्रिवेंद्र को कौन तवज्जो देगा? घोषणाएं कोरी घोषणाएं ही रहेंगी। जनता तक संदेश चला गया है कि त्रिवेंद्र अब इंद्र नहीं। माना जा रहा है कि त्रिवेंद्र का राजनीतिक भविष्य गहरे अंधकार में जा रहा है।

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