न्यायिक प्रक्रिया और फीस निर्धारण के बाद अब फीस जमा करने में किंतु परंतु क्यों!

भारतीय न्याय व्यवस्था सर्वोपरी है. न्याय प्रक्रिया  लंबी व दीर्घकालिक हो सकती है, लेकिन अंत में वास्तव में न्याय  अवश्य मिलता है. एसजीआरआर मेडिकल कॉलेज की बहु प्रतीक्षित फीस निर्धारण प्रकरण पर निर्णय आ गया है. एम. बी.बी.एस.व पी.जी.के छात्र छात्राओं को अब बढ़ी हुई फीस का भुगतान करना चाहिए. अब तक यही छात्र छात्राएं फीस निर्धारित न होने के चलते देश के अन्य मेडिकल कॉलेजों की तुलना में सबसे कम फीस देकर पढ़ाई कर रहे थे. सरकारी नीतियों की खामियों व देरी की चलते तत्कालीन समय में काउंसलिंग व प्रवेश प्रक्रिया के दौरान फीस निर्धारित नहीं थी. उस समय छात्र छात्राओं ने माननीय उच्च न्यायालय में शपथ पत्र भरकर ये घोषणा की थी कि जब भी फीस निर्धारित हो होगी, वे निर्धारित बढ़ी हुई फीस का भुगतान करेगें.

लगभग 5 वर्षों की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद निर्णय आया है व फीस निर्धारित हुई है. छात्र छात्राओं व उनके अभिभावकों को देश के जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय देना चाहिए. उन्हें देश के न्यायालय के आदेश का सम्मान करना चाहिए , न कि उसका उलंघन. कानून से बढ़कर कोई नहीं है. इस मामले पर कानून के खिलाफ़ कोई नहीं जायेगा, और न ही कोई आपकी मदद करेगा.

मेडिकल कॉलेज के संसाधनों का दोहन छात्र छात्राएं अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिय नहीं कर सकते हैं. बॉन्ड की शर्तों को तोड़कर, राज्य को नुकसान पहुंचाकर, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सेवाएं दिए बिना प्राईवेट प्रेक्टिस कहां तक उचित है. एम. बी.बी. एस. व पी. जी. कोर्स करने के दौरान सशर्त बॉन्ड भरने के बावजूद बॉन्ड को न मानने वाले व

बॉन्ड तोड़ने वाले डोक्टरों पर सरकार ने एक करोड़ रुपए से लेकर 2 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाया है. यह बेहद शर्मनाक है कि सरकार के साथ किय गए अनुबंध को पूरा किए बिना डॉक्टरों ने अनुबंध तोड़ दिया. पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को इससे भारी नुकसान हुआ. राज्य की लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं से सभी परिचित हैं, उचित स्वास्थ सेवाओं न के अभाव में कई बार  सड़क पर ही डिलीवरी हो जाती है. डॉक्टरों  के अभाव में कई लोगों को जान तक गवानी पड़ती है।

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