Uttarakhand News:  वन विभाग में हुए तबादलो को 11 दिन में CSB का फैसला पलटा। विभाग में हड़कंप

देहरादून: उत्तराखंड वन विभाग में तबादला नीति ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। सिविल सर्विस बोर्ड (CSB) के 1 अगस्त को लिए गए तबादला फैसले को महज 11 दिन में पलट दिया गया, जिससे विभाग में हड़कंप मच गया।

इस उलटफेर ने न केवल अफसरों की नींद उड़ा दी, बल्कि तबादला प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए।

विनय भार्गव का तबादला स्थगित, मुख्यालय में अटैच

वन संरक्षक विनय कुमार भार्गव को 11 दिन पहले नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व का प्रभारी बनाया गया था। लेकिन अब शासन ने इस आदेश को अस्थायी रूप से स्थगित कर उन्हें देहरादून में प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) के कार्यालय में अटैच कर दिया। हैरानी की बात यह है कि इस बदलाव का कोई कारण आदेश में दर्ज नहीं किया गया।

हाईकोर्ट की दखल और शासन का बैकफुट

तबादला सूची जारी होते ही विवाद ने जोर पकड़ा। IFS अधिकारी विनय भार्गव और पंकज कुमार ने हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने भले ही भार्गव को राहत न दी, लेकिन पंकज कुमार के तबादले पर शासन को पुनर्विचार का निर्देश दिया।

इसके बाद शासन ने स्वतः ही भार्गव का तबादला रद्द कर उन्हें मुख्यालय में अटैच करने का फैसला लिया। इस कदम ने वन विभाग में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मंत्री का मौन, अफसरों में असमंजस

वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस पूरे प्रकरण पर चुप्पी साध रखी है। तबादला आदेश में कारणों का अभाव और शीघ्र बदलाव ने विभागीय अफसरों में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।

बार-बार तबादले बने विवाद का केंद्र

इस बार विवाद की जड़ में बार-बार तबादले हैं। कई अफसरों को दो साल से भी कम समय में एक से अधिक बार स्थानांतरित किया गया। हाईकोर्ट में भी यही तर्क दिया गया कि लगातार तबादले से कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। सूची में कई ऐसे नाम हैं, जिनके तबादले बार-बार हुए, जिसे अब विभाग में “जंगल का खेल” कहा जा रहा है।

तबादला नीति पर उठते सवाल

वन विभाग में तबादला प्रक्रिया अब एक अनिश्चित और रोमांचक खेल बन गई है। अफसरों के बीच यह सवाल आम है कि अगला तबादला कब और कहां होगा।

इस पूरे मामले ने तबादला नीति की पारदर्शिता और स्थिरता पर सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार तबादले न केवल प्रशासनिक अस्थिरता को बढ़ाते हैं, बल्कि विभाग के दीर्घकालिक लक्ष्यों को भी प्रभावित करते हैं।

शासन के इस फैसले ने जहां अफसरों में हड़कंप मचा दिया है, वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या उत्तराखंड में तबादला नीति को और अधिक व्यवस्थित करने की जरूरत है? फिलहाल, इस मसालेदार प्रकरण पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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