बड़ी खबर : बहुगुणा, यशपाल, चैंपियन और महाराज की अलग खिचड़ी से बिगड़ेगा जीत का जायका !!

आखिर क्या कारण है कि भाजपा के लोकसभा प्रत्याशियों के चुनावी अभियान से कुछ भाजपाई दिग्गजों ने अपने आप को बिल्कुल किनारे किया हुआ है !

टिहरी की टीस

 जाहिर है कि सब कुछ सही नही है। यहां तक कि टिहरी संसदीय सीट की प्रत्याशी माला राज्य लक्ष्मी शाह के नामांकन से टिहरी के पूर्व सांसद विजय बहुगुणा पूरी तरह नदारद थे और उन्होंने खुद को चुनावी अभियान से भी किनारे किया हुआ है। जाहिर है कि ‘मोम की गुड़िया’ के लिए अभी तक बहुगुणा पिघले नहीं है।
पौड़ी की पीड़ा 
 वहीं पौड़ी लोकसभा के सांसद प्रत्याशी तीरथ सिंह रावत के नामांकन के वक्त भी सतपाल महाराज नदारद थे हालांकि सतपाल महाराज द्वारा अधिकृत रूप से पहले ही बता दिया गया था कि वह फूड प्वाइजनिंग के कारण दिल्ली में डॉक्टरों की देखरेख में हैं और उन्हें एक सप्ताह तक आराम की सलाह दी गई है। महाराज की नदारदगी को पिछले विधानसभा चुनाव में तीरथ सिंह रावत की नदारदगी के आईने में भी देखा जाना चाहिए। गौरतलब है कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में तीरथ सिंह रावत का चौबट्टाखाल सीट से टिकट काटकर सतपाल महाराज को थमा दिया गया था। इससे नाराज होकर तीरथ सिंह रावत लाख बुलाने पर भी सतपाल महाराज के चुनाव प्रचार में नहीं गए थे।
नैनीताल का मलाल
 नैनीताल लोकसभा प्रत्याशी अजय भट्ट के कार्यक्रम श्री यशपाल आर्य भी अनुपस्थित रहे। तो वहीं पूछे जाने पर अजय भट्ट ने तो यशपाल आर्य की तुलना चूहे से ही कर दी। मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि यशपाल आर्य का यहां क्या काम ! जाहिर है कि यशपाल आर्य नैनीताल लोकसभा सीट से टिकट के प्रबल दावेदारों में से एक थे। अब उनकी नदारदगी उनकी नाराजगी को बयां कर रही है। हालांकि कल के समारोह में यशपाल आर्य के पुत्र संजीव आर्य जरूर मौजूद रहे।
हरिद्वार मे हाहाकार
 हरिद्वार लोकसभा सीट पर तो कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन अपनी पत्नी को टिकट दिलाने के लिए इतना आमादा थे कि वहां प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री के खिलाफ बयानबाजी करने से भी नहीं चूके और हालात इतने बिगड़ गए थे कि उन्हें प्रदेश नेतृत्व ने नसीहत की घुट्टी भी पिलाई गई।
 आखिर क्या कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़े जा रहे इस चुनाव में भाजपा के अंदर मनमुटाव के इस सार्वजनिक प्रदर्शन का कोई समाधान नहीं किया जा सका है !
कितना बिगड़ेगा जायका !
मतदान में मात्र एक पखवाड़ा ही बचा है, ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि जैसे-जैसे चुनाव अभियान गति पकड़ेगा वैसे वैसे यह मनमुटाव और सतह पर आएगा या फिर नरेंद्र मोदी के बड़े कद के पीछे छुपा लिया जाएगा।
जाहिर है कि यदि इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने एक भी सीट गंवाई तो उत्तराखंड में भाजपा की जीत का जायका तो बिगड़ेगा ही, साथ ही नाराज नेताओं के लिए भी आगे की राहें आसान नहीं होंगी।

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