निशंक की चाय-प्याले मे सियासी तूफान

भूपेंद्र कुमार

पुर्व मुख्यमंत्री के यहां हुई चाय पार्टी ने खड़े  किये कई सवाल। 3 पुर्व मुख्यमंत्री सह संगठन मंत्री  शिव प्रकाश और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य ,ज़िला अध्यक्ष और 2 दर्जन विधायक पहुंचे निशंक की चाय पार्टी में। लेकिन मुख्यमंत्री रहे नदारद।2019 के चुनावों की तैयारी की बैठक में क्यों नही थे मुख्यमंत्री!

उत्तराखंड के देहरादून में भाजपा की आजीवन सहयोग निधि के कार्यक्रम के बाद हरिद्वार सांसद रमेश पोखरियाल निशंक की चाय पार्टी ने कई तरह की सियासी चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

 निशंक के आवास पर बीजेपी के दिग्गज नेताओं के जमावड़े से यह चर्चाएं तेज हो गई है कि आने वाले समय में बड़ा उलटफेर हो सकता है।
 इस कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, भगत सिंह कोश्यारी और उनके खेमों के कई भाजपाइयों की गोपनीय बैठक हुई।
 इसमें केदार सिंह रावत, बंशीधर भगत, राजकुमार ठुकराल से लेकर तमाम भाजपा नेता भी शामिल थे।
बंशीधर भगत अपनी विधानसभा के ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे की मौत पर वादाखिलाफी को लेकर मुख्यमंत्री से खफा चल रहे हैं तो भुवन चंद्र खंडूरी भी लोकायुक्त को लेकर सरकार पर हमलावर हो चुके हैं। सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत अपने महकमों के कामकाज में मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप को लेकर अपनी नाराजगी कई बार सार्वजनिक कर चुके हैं। ताजा मामला कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन का है।
हालांकि पर्वतजन के पूछने पर कुछ नेताओं ने यह बात कही कि मीटिंग केवल मंत्रिमंडल के विस्तार और दायित्व धारियों के मनोनयन और आगामी राज्यसभा, लोकसभा तथा नगर निकाय चुनाव तक सीमित थी।
 इस चाय पार्टी से त्रिवेंद्र सिंह रावत की नदारदगी और उनके खेमे के करीबी नेताओं की गैरमौजूदगी से इस बात को बल मिला है कि यह मीटिंग मुख्यमंत्री से नाराज चल रहे सभी धड़ों के एक मंच पर एकजुट होने की शुरुआत हो गई है।
 12 फरवरी को जनता जन आंदोलन चैरिटेबल ट्रस्ट के कुछ लोगों ने जिलाधिकारी को भी एक ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम बनाया है। जिसमें जिलाधिकारी देहरादून के माध्यम से एक ज्ञापन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भिजवाया जाएगा।
 इसमें कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन की बात को जायज बताते हुए उस पर कार्यवाही करने की मांग की गई है। यह एक तरीके से आग में घी डालने जैसी बात है। यदि जल्दी ही सरकार ने डैमेज कंट्रोल की दिशा में कोई कदम नहीं बढ़ाया तो आने वाले समय में त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं।

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