विधायक का विवादित वीडियो:कांग्रेसी उपवास मे बहके धामी

कृष्णा बिष्ट
हल्द्वानी मे बीजेपी सरकार द्वारा गोलापार आई.एस.बी.टी का स्थान परिवर्तन करने के फैसले के विरोध मे क्षेत्र की विधायक इंद्रा ह्रदयेश के नेेेेतृत्व मे कांग्रेस के अलग–अलग विधानसभाओं से आये लगभग आधा दर्जन पूर्व व वर्तमान विधायकों ने राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह आदि के साथ एक दिवसीय उपवास कार्यक्रम मे शामिल थे।
सब कुछ ठीक –ठाक चल ही रहा था कि हमेशा की तरह अपने  विवादित बयानों से सुर्खियां बटोरने वाले धारचूला विधायक हरीश धामी मंच से अपना भाषण देते कुछ ऐसा कह बैठे जो कांग्रेस की इस पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है।
धामी का मंच से कहना था कि  “कांग्रेस अभी मरी नही है, कांग्रेस पार्टी ही है जिसने देश से फिरंगियों को खदेड़कर बाहर भगा दिया। उस कांग्रेस का मुट्ठीभर भाजपा के भगवाधारी  कुछ नही कर सकते है, इन साधु संतों को इनकी औकात बतानी होगी, इनको वहीं बैठाना होगा जहाँ साधु संत बैठते हैं, इनको राज करने का अधिकार नही है, ये केवल जनता का शोषण कर रही है, आज बस केवल अडानी और बाबा रामदेव जैसे लोगों का ही विकास हो रहा है”। अब देखना होगा कि हरीश धामी की इस बात का खुद को हिन्दूवादी सरकार बताने वाली बीजेपी क्या जबाब देती है!
 इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री का न पहुँचना भी अपने–आप मे कांग्रेस के अन्दर की गुटबाजी व खींच–तान को बयां करने को काफ़ी है।
 मंच पर उपस्थित सभी नेताओं ने सरकार के खिलाफ एक सुर मे लोगों से आगामी निकाय और लोकसभा चुनाव में बी.जे.पी को सबक सिखाने का आह्वान किया। इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने कहा कि सिंगल इंजन की जब उनकी सरकार थी तो सारे विकास कार्य हो रहे थे। आई.एस.बी.टी भी बन रहा था, स्टेडियम भी बन रहा था। लेकिन डबल इंजन की सरकार आते ही सारे विकास कार्य रुक गए।
हल्द्वानी की राजनीती मे आई.एस.बी.टी  का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर झांकने लगा है। गोलापार मे आई.एस.बी.टी के नाम से जनता का करोड़ों रुपया स्वाहा करने के बाद एक बार फिर से राजनीतिक शह मात का खेल चरम पर है। पिछली सरकार ने आई.एस.बी.टी के लिये जिस स्थान का चयन किया था, उस स्थान को बी.जे.पी की सरकार के सत्ता मे आने के बाद खामियाँ गिना के रद्द कर नये स्थान पर बनाने का निर्णय लिया है।
 माना जा रहा है कि यह पूरा मुद्दा कभी एक ही दल मे रहे क्षेत्र के ही दो बडे नेताओं के वर्चस्व की लडाई का नतीज़ा है। जिस का खामियाज़ा कहीं न कहीं जनता को ही उठाना है।

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