साल भर से ठप्प जन्म मृत्यु का पंजीकरण। डबल इंजन पर ब्रेक ! कर्मचारी सड़क पर।

उत्तराखंड में  जन्म मृत्यु का ऑनलाइन पंजीकरण करने वाले कर्मचारियों की संविदा मार्च 2017 को समाप्त हुई तो फिर इनके संविदा विस्तार की फाइल साल भर से सचिवालय में ही घूम रही है।
 इन कर्मचारियों की तैनाती वर्ष 2015 में की गई थी। जन्म मृत्यु के ऑनलाइन पंजीकरण का काम ठप पड़ा है। केंद्र सरकार की योजना के अनुसार सभी जन्म मृत्यु का ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य है। इसके लिए हर जिले सीएमओ दफ्तर में एक डाटा प्रोसेसिंग सहायक की तैनाती की गई है। स्वास्थ्य महानिदेशालय कई बार शासन को लिख चुका है लेकिन नतीजा अभी भी शून्य है।
उत्तराखंड शासन ने उत्तर प्रदेश में चल रही इस तरह की व्यवस्था के बारे में भी पता किया तो स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय उत्तर प्रदेश ने 2 मई 2017 को अपने पत्र द्वारा अवगत कराया कि उनके यहां तो कार्यक्रम चलाने के लिए पैसा तक नहीं है लेकिन स्वीकृति की प्रत्याशा में कर्मचारियों से निरंतर कार्य लिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश का उदाहरण मिलने के बाद भी उत्तराखंड के अफसरों ने आंखें मूंद ली।
 हाल ही में पता चला है कि शासन नए सिरे से डाटा प्रोसेसिंग सहायकों की तैनाती करने का विचार कर रहा है। यदि संविदा विस्तार न कर के नए सहायकों की भर्ती की जाती है तो पहले से काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरी चली जाएगी। ऐसे में वह अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित दिखाई दे रहे हैं।
महानिदेशक भी कर चुके सेवा विस्तार के लिए अनुरोध
एक साल पहले स्वास्थ्य महानिदेशक तथा अपर मुख्य रजिस्ट्रार (जन्म मृत्यु) ने 15 मई 2017 को अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि जन्म मृत्यु पंजीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत संविदा कर्मियों की पुनर्बहाली और सेवा विस्तार किया जाना बहुत जरूरी है क्योंकि इनके बिना काम नहीं चल सकता और ना ही कार्यक्रम को गतिशील रखा जा सकता है।
साथ ही उन्होंने कहा था कि अन्य अधिकारियों के पास अत्यधिक कार्य बोझ है इसलिए संविदा कर्मियों की पुनर्बहाली करते हुए उनका सेवा विस्तार कर दिया जाए।
 स्वास्थ्य महानिदेशक ने इसकी नितांत आवश्यकता बताई थी। स्वास्थ्य महानिदेशक ने उत्तरप्रदेश  में चल रही व्यवस्था का हवाला देते हुए यह भी बताया था कि उत्तर प्रदेश में उक्त कार्यक्रम के अंतर्गत भले ही बजट आवंटित नहीं है फिर भी उनकी सेवाएं ली जा रही है, इसलिए उत्तराखंड में तो बजट भी आवंटित है ऐसे में इनकी नितांत आवश्यकता है। इसके बावजूद शासन ने न तो राज्य की आवश्यकताओं के मद्देनजर इसका संज्ञान लिया और न ही एक साल से बिना वेतन के अनिश्चितता के भंवर में डूब-उतरा रहे कर्मचारियों के विषय में मानवीयता के दृष्टिकोण से कोई फैसला लेना उचित समझा।
 ऐसा नहीं है कि शासन को इस बात का कोई संज्ञान नहीं है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट भी इनकी बहाली के लिए पैरवी कर चुके हैं। नौकरी से बाहर हुए यह कर्मचारी मुख्यमंत्री मुख्यसचिव से लेकर स्वास्थ्य विभाग के सभी अधिकारियों के दरवाजों पर अपनी एडीआर रगड़-रगड़ कर थक चुके हैं लेकिन कोई संज्ञान लेने को राजी ही नहीं है।
पैसा है तो फिर क्या परेशानी है!
उत्तराखंड शासन के चिकित्सा अनुभाग-3 में प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण योजना जन्म मृत्यु पंजीकरण के कार्मिकों की सेवा विस्तार संबंधी फाइल नंबर 20 /2017 विगत 22 मार्च 2017 से उत्तराखंड शासन में लंबित है जिसके अंतर्गत उत्तराखंड राज्य में 36,लाख लाख का बजट 2017 में प्रावधानित हो चुका है एवं 2018 में भी बजट प्रावधानित हो चुका है लेकिन आज तक कार्मिकों की सेवा विस्तार पर कोई फैसला नहीं हो पाया।
जबकि माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा प्रकरण को कैबिनेट में रखने हेतु तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव ओम प्रकाश को निर्देश दिए गए थे। उसके उपरांत फ़ाइल में मुख्यमंत्री का अनुमोदन भी प्राप्त हो चुका था और पत्रावली गोपन विभाग को प्रेषित करने हेतु आदेशित किया गया था? लेकिन प्रकरण को आज तक कैबिनेट के सम्मुख क्यों नहीं रखा गया यह सबसे बड़ा प्रश्न उठता है?
आज दिनांक तक कार्मिकों के सेवा विस्तार के संबंध में कोई भी प्रशासनिक निर्णय क्यों नहीं लिया गया है!  यह स्वास्थ्य विभाग की बहुत बड़ी लापरवाही है।  इस जन्म मृत्यु पंजीकरण में प्रदेश की सारी रजिस्ट्रेशन यूनिटों को ऑनलाइन किया जाना था साथ ही भारत सरकार के सॉफ्टवेयर से जोड़ना था, जिसमें 10% कार्य कार्यरत कार्मिकों द्वारा 2017 से पूर्व किया गया था, जिसमें 90% कार्य शेष है।
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया को उत्तराखंड के स्वास्थ्य विभाग ने फेल कर दिया है। इस लापरवाही का कौन जिम्मेदार है ! यह सबसे बड़ा प्रश्न उठता है इसमें क्या स्वास्थ्य सचिव कोई जांच करेंगे यह भी एक प्रश्न है !
क्यों नहीं आज तक इतनी महत्वपूर्ण  योजना में प्रशासनिक निर्णय लिया गया? महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की ओर से 1 साल से कार्मिकों की व्यवस्था के लिए शासन को पत्राचार किया जा रहा है। क्यों शासन इसका जवाब देना उचित नहीं समझता है !

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