मोरी, उत्तरकाशी। सितंबर 2026।नीरज उत्तराखंडी
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC), सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार की हनी मिशन योजना के तहत मोरी क्षेत्र में लाभार्थियों को वितरित बी-बॉक्स, मधुमक्खी कॉलोनियों और टूल किट की गुणवत्ता को लेकर उठे सवाल अब जांच के दायरे में पहुंच गए हैं। भद्रासू, नानाई, सुनकुंडी और पांव तल्ला क्षेत्र के लाभार्थियों ने फरवरी 2026 में वितरित सामग्री में गंभीर खामियां होने के आरोप लगाए हैं।
पर्वत जन पत्रिका ने इस मामले को पहले ही प्रमुखता से उठाते हुए हनी मिशन के तहत वितरित सामग्री की गुणवत्ता और पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप उसकी उपयोगिता पर सवाल खड़े किए थे। समाचार प्रकाशित होने और लाभार्थियों की ओर से लगातार पत्राचार एवं शिकायत के बाद मामला अब विभागीय अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के निरीक्षण तक पहुंचा है।
बीमार और बिना रानी वाली कॉलोनियां मिलने का आरोप
लाभार्थियों का आरोप है कि उन्हें दी गई कुछ मधुमक्खी कॉलोनियां सड़ी-गली, मृत अथवा बीमारी से प्रभावित थीं। कुछ कॉलोनियों में रानी मधुमक्खी तक नहीं होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मधुमक्खी पालन को स्वरोजगार का माध्यम बनाने वाली योजना में यदि शुरुआती स्तर पर ही कमजोर अथवा अनुपयुक्त कॉलोनियां उपलब्ध करा दी जाएं तो लाभार्थी उत्पादन कैसे बढ़ा पाएंगे?
टाइप-A बॉक्स बनाम पर्वतीय जरूरत
लाभार्थियों ने सबसे गंभीर तकनीकी आपत्ति बी-बॉक्स के प्रकार और मधुमक्खी की प्रजाति को लेकर दर्ज कराई है।
उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्र की ठंडी जलवायु के लिए टाइप-B बॉक्स और उत्तर भारतीय एपिस सेरेना अधिक उपयुक्त है, जबकि उन्हें कथित रूप से टाइप-A बॉक्स तथा दक्षिण भारतीय एपिस सेरेना उपलब्ध कराई गई।
लाभार्थियों के अनुसार एपिस सेरेना में क्षेत्रीय रूप से अलग-अलग आकार और जलवायु-अनुकूलन वाली आबादियां पाई जाती हैं। उनका दावा है कि दक्षिण भारतीय प्रकार अपेक्षाकृत छोटे आकार का होने के कारण टाइप-A बॉक्स से जोड़ा जाता है, जबकि उत्तर भारतीय प्रकार के लिए बड़े टाइप-B बॉक्स की आवश्यकता होती है। उनका कहना है कि मोरी जैसे ऊंचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में इस तकनीकी अंतर की अनदेखी मधुमक्खी पालन की सफलता को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि इन दावों की अंतिम तकनीकी पुष्टि KVIC की जांच रिपोर्ट से ही होगी।
टूल किट में भी मानक से समझौते का आरोप
लाभार्थियों ने टूल किट की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार—
01. फ्रेम में निर्धारित मानक के अनुरूप स्टेनलेस स्टील तार नहीं लगाई गई।
02. आवश्यक स्टेनलेस स्टील के उपकरणों के स्थान पर सामान्य लोहे के उपकरण दिए गए।
03. टूल किट की कई सामग्री निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं थी।
04. बी-बॉक्स के जॉइंट निर्धारित मानक के अनुरूप नहीं बनाए गए।
05. प्रत्येक बॉक्स के साथ दिए जाने वाले फीड बॉक्स उपलब्ध नहीं कराए गए।
06. बॉक्स पर KVIC का लोगो, नंबरिंग और वर्ष अंकित नहीं होने का भी आरोप है।
इन आरोपों की तकनीकी जांच होने पर ही यह स्पष्ट होगा कि आपूर्ति वास्तव में निविदा की शर्तों और निर्धारित भारतीय मानकों के अनुरूप थी अथवा नहीं।
15 लाभार्थी, लेकिन सवाल पूरे सिस्टम पर
उत्तरकाशी और चमोली जनपदों के कुल 15 किसान, बागवान एवं मधुमक्खी पालकों को फरवरी 2026 में हनी मिशन के तहत बी-बॉक्स एवं टूल किट वितरित किए गए थे। हिमालयन मानव संस्थान (हिमांस), मोरी/पुरोला से जुड़े लाभार्थियों के अनुसार संगठन के माध्यम से वर्ष 2022 और 2024 में KVIC के अंतर्गत दस-दस दिवसीय प्रशिक्षण भी कराया गया था।
हिमांस के अनुसार, 15 सदस्यों में से तीन लाभार्थियों ने योजना के तहत निर्धारित 20 प्रतिशत अंशदान के रूप में प्रति लाभार्थी ₹7,750 करीब दो वर्ष पहले जमा किया था। ऐसे में सवाल यह है कि जब लाभार्थियों ने प्रशिक्षण लिया, अंशदान दिया और योजना के तहत स्वरोजगार की उम्मीद लगाई तो उन्हें उपलब्ध कराई गई सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी?
शिकायत के बाद अधिकारियों और विशेषज्ञों का निरीक्षण
हिमांस के प्रतिनिधियों ने बताया कि सामग्री को लेकर कई बार पत्राचार और शिकायत की गई। इसके बाद KVIC के राज्य कार्यालय देहरादून, संबंधित अधिकारी, सप्लायर, तकनीकी विशेषज्ञ और बी-कीपिंग से जुड़े जानकारों ने क्षेत्र का निरीक्षण किया।
बताया गया कि निरीक्षण के दौरान भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम, स्थानीय फ्लोरा और मौसमी मधु प्रवाह का भी जायजा लिया गया। उड़ीसा, सहारनपुर, प्रयागराज आदि स्थानों से आए विशेषज्ञों और बी-कीपरों ने भी लाभार्थियों से चर्चा की।
अब KVIC मुंबई की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
निरीक्षण के बाद लाभार्थियों को उम्मीद है कि मामले की तकनीकी रिपोर्ट KVIC के उच्च स्तर पर भेजी जाएगी और आगामी सीजन में पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप नई स्वस्थ मधुमक्खी कॉलोनियां एवं उपयुक्त बी-बॉक्स उपलब्ध कराने पर निर्णय लिया जाएगा।
हिमांस अध्यक्ष एवं लाभार्थी भगत सिंह ने कहा कि मामला अब केवल वितरित सामग्री की शिकायत तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि तकनीकी जांच में कमियां प्रमाणित होती हैं तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और लाभार्थियों को उनकी योजना का वास्तविक लाभ मिलना चाहिए।
‘पर्वत जन पत्रिका’ की पड़ताल से उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण में ‘पर्वत जन पत्रिका’ की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। पत्रिका ने हनी मिशन के तहत वितरित सामग्री को लेकर सामने आ रही शिकायतों को प्रमुखता से प्रकाशित कर संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान इस ओर खींचा था।
मुद्दा उठने के बाद शिकायतों, पत्राचार और स्थल निरीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अब जांच के जरिए यह सामने आना बाकी है कि लाभार्थियों द्वारा लगाए गए आरोप कितने सही हैं और यदि सामग्री मानकों के विपरीत मिली तो इसके लिए सप्लायर से लेकर गुणवत्ता परीक्षण और स्वीकृति की प्रक्रिया तक किस स्तर पर जवाबदेही तय होगी।
जांच के सामने ये 8 बड़े सवाल
1. क्या वितरित बी-बॉक्स निर्धारित निविदा शर्तों के अनुरूप थे?
2. क्या बॉक्स का प्रकार पर्वतीय जलवायु और निर्धारित मधुमक्खी प्रजाति के अनुकूल था?
3. क्या मधुमक्खी कॉलोनियां स्वस्थ और रानी सहित उपलब्ध कराई गई थीं?
4. क्या टूल किट की सामग्री निर्धारित भारतीय मानकों के अनुरूप थी?
5. फीड बॉक्स सहित पूरी सामग्री क्यों नहीं मिली, यदि वह आपूर्ति का हिस्सा थी?
6. बॉक्स पर KVIC की पहचान, नंबरिंग और वर्ष अंकित करने की शर्त थी तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ?
7. सामग्री की गुणवत्ता की आपूर्ति से पहले तकनीकी जांच किसने की?
8. यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है तो भुगतान, सप्लायर और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय होगी?
भगत सिंह ने हरिश नेगी के प्रयासों को दिया श्रेय
हिमांस अध्यक्ष भगत सिंह ने इस मामले को KVIC के स्तर तक पहुंचाने में हरिश नेगी, इंजीनियर पेट्रोलियम, चमोली एवं वर्तमान में नोएडा/दिल्ली निवासी के प्रयास और मार्गदर्शन के लिए विशेष आभार जताया। उन्होंने कहा कि उनके प्रयासों से मामले को गंभीरता से उठाने और संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने में मदद मिली।
उन्होंने हिमांस के सक्रिय सदस्यों का भी आभार जताते हुए कहा कि संगठन भविष्य में भी जनहित, स्वरोजगार और समाजसेवा के लिए सक्रिय रहेगा।
बड़ा सवाल : मधुमक्खी पालन को स्वरोजगार बनाएगी योजना या कागजों में ही रहेगा मिशन?
हनी मिशन का उद्देश्य किसानों और ग्रामीण युवाओं को मधुमक्खी पालन से जोड़कर स्वरोजगार के अवसर पैदा करना है। ऐसे में योजना की सफलता केवल बी-बॉक्स बांट देने से नहीं, बल्कि स्वस्थ कॉलोनी, गुणवत्तापूर्ण उपकरण, स्थानीय जलवायु के अनुरूप तकनीक और वास्तविक उत्पादन से तय होगी।
अब देखना होगा कि KVIC की जांच रिपोर्ट लाभार्थियों की शिकायतों को किस रूप में दर्ज करती है और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ लाभार्थियों को वास्तविक रूप से नुकसान की भरपाई और उपयुक्त सामग्री उपलब्ध कराने की कार्रवाई होती है या नहीं।


