- गोरे और सुंदर बच्चे की चाहत के नाम पर नेपाली युवतियों के शोषण का आरोप, दलालों के जरिए करोड़ों का खेल होने का दावा
सीमावर्ती क्षेत्र। 18 सितंबर।नीरज उत्तराखंडी
भारत-नेपाल सीमा से जुड़े इलाकों में मानव तस्करी का एक चिंताजनक पैटर्न सामने आने का दावा किया जा रहा है। आरोप है कि संतान की चाहत और कथित तौर पर ‘गोरे और सुंदर बच्चे’ की मांग को दलालों ने अवैध कारोबार का माध्यम बना लिया है। आर्थिक रूप से कमजोर नेपाली युवतियों को बेहतर भविष्य और मोटी रकम का लालच देकर भारत लाने तथा गर्भधारण के बाद नवजात को इच्छुक दंपत्तियों को सौंपने का कथित नेटवर्क चिंता का विषय बन गया है।
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या संतान की चाहत अब महिलाओं के शरीर और मातृत्व के शोषण का बाजार बनती जा रही है?
दलालों के लिए करोड़ों का कारोबार, युवतियों के हिस्से में कथित तौर पर मामूली रकम
बताया जा रहा है कि इस कथित नेटवर्क में दलाल निःसंतान दंपत्तियों से बच्चे के नाम पर बड़ी रकम वसूलते हैं। कुछ दावों के मुताबिक एक मामले में यह रकम करीब एक करोड़ रुपये तक बताई जा रही है, जबकि गर्भधारण के लिए तैयार की गई युवती को कथित तौर पर 20 से 25 लाख रुपये देने की बात सामने आती है।
हालांकि इन रकमों और पूरे नेटवर्क के आकार की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। इसलिए इन दावों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
एक से डेढ़ साल तक युवती को रखने का आरोप
कथित तौर पर दलाल युवतियों को भारत लाकर लंबे समय तक अपने नियंत्रण में रखते हैं। आरोप है कि प्राकृतिक गर्भधारण के लिए उन्हें संबंधित पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता है। गर्भधारण के बाद प्रसव तक उनकी निगरानी की जाती है और बच्चे के जन्म के तुरंत बाद नवजात को इच्छुक दंपत्ति को सौंप दिया जाता है।
इसके बाद युवती को वापस नेपाल भेज दिए जाने का भी दावा है। यदि जांच में ऐसे मामले सही पाए जाते हैं तो यह केवल अवैध सरोगेसी का मामला नहीं, बल्कि महिला की स्वतंत्रता, सहमति, गरिमा और मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला होगा।
भारत-नेपाल सीमा पहले भी उठे हैं सवाल
भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र में महिलाओं की तस्करी और प्रजनन से जुड़े अवैध कारोबार के आरोप नए नहीं हैं। पूर्व में रुपईडीहा क्षेत्र से महिलाओं के पकड़े जाने और सरोगेसी तथा अंडाणु से जुड़े नेटवर्क के आरोपों की रिपोर्टिंग हो चुकी है।
हाल के वर्षों में सीमावर्ती बिहार क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में लड़कियों के लापता होने और मानव तस्करी के संभावित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की जांच की मांग सामने आई है। एक रिपोर्ट में सामाजिक संगठनों द्वारा सरोगेसी, जबरन विवाह और अन्य उद्देश्यों के लिए तस्करी की आशंका जताई गई थी।
कानून की नजर में ‘किराये की कोख’ का कारोबार
भारत में सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत व्यावसायिक सरोगेसी प्रतिबंधित है। इसके साथ ही सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियों के लिए भी नियामकीय ढांचा मौजूद है।
ऐसे में यदि किसी महिला को पैसे के लालच, धोखे, दबाव या तस्करी के माध्यम से गर्भधारण के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। जांच एजेंसियों को यह देखना होगा कि कहीं इसके पीछे फर्जी दस्तावेज, बिचौलिये, अवैध क्लीनिक, चिकित्सकीय सुविधाएं या सीमा पार संगठित नेटवर्क तो सक्रिय नहीं है।
‘गोरे बच्चे’ की चाहत ने बढ़ाया नया खतरा?
इस कथित कारोबार का सबसे संवेदनशील पहलू बच्चे के रंग-रूप को लेकर मांग है। यदि आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को केवल इसलिए तलाशा और इस्तेमाल किया जा रहा है कि उनसे कथित तौर पर ‘गोरा और सुंदर’ बच्चा पैदा कराया जा सके, तो यह मामला केवल मानव तस्करी तक सीमित नहीं रहता।
यह जातीय-नस्ली पूर्वाग्रह, महिला के शरीर के व्यावसायिक इस्तेमाल और बच्चे को वस्तु की तरह खरीदने-बेचने की मानसिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
सीमा पर निगरानी से आगे जांच की जरूरत
ऐसे मामलों की जांच केवल सीमा चौकियों तक सीमित रहने से काम नहीं चलेगा। पुलिस, एसएसबी, मानव तस्करी रोधी इकाइयों, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा स्वास्थ्य विभाग के बीच समन्वित जांच की आवश्यकता है।
जांच में विशेष रूप से यह पता लगाया जाना चाहिए कि—
- युवतियों को सीमा पार कौन ला रहा है?
- उन्हें भारत में कहां ठहराया जाता है?
- दलालों और इच्छुक दंपत्तियों के बीच संपर्क कौन कराता है?
- क्या किसी क्लीनिक या चिकित्सकीय व्यक्ति की भूमिका है?
- गर्भधारण और प्रसव का चिकित्सकीय प्रबंधन कहां होता है?
- नवजात की कानूनी पहचान और जन्म प्रमाणपत्र कैसे तैयार होते हैं?
- युवतियों को वास्तव में कितनी रकम दी जाती है?
- क्या उनकी सहमति स्वतंत्र और सूचित थी या उन्हें लालच/दबाव में रखा गया?
मानव तस्करी के इस कथित नेटवर्क की तह तक पहुंचना इसलिए जरूरी है क्योंकि यहां सिर्फ एक बच्चे की चाहत का सवाल नहीं है—यह उन महिलाओं की गरिमा और स्वतंत्रता का सवाल है, जिनकी आर्थिक मजबूरी को कथित तौर पर बाजार में बदल दिया गया है।


