मेडिकल कालेज सेना को सौंपा, अस्पताल से भी फेरा मुंह

श्रीनगर। साहब, मेडिकल काॅलेज तो सेना को दे दिया आपने, श्रीनगर कंबाइंड अस्पताल का भी कुछ सोचा है? कुछ इस तरह के सवाल आजकल क्षेत्रीय जनता अपने हुक्मरानों से पूछती हुई नजर आ रही है। पौड़ी गढ़वाल जनपद का श्रीनगर शहर आजकल चर्चाओं में है। कारण श्रीनगर में मौजूद मेडिकल काॅलेज अस्पताल सेना के सुपुर्द […]

श्रीनगर। साहब, मेडिकल काॅलेज तो सेना को दे दिया आपने, श्रीनगर कंबाइंड अस्पताल का भी कुछ सोचा है?

कुछ इस तरह के सवाल आजकल क्षेत्रीय जनता अपने हुक्मरानों से पूछती हुई नजर आ रही है। पौड़ी गढ़वाल जनपद का श्रीनगर शहर आजकल चर्चाओं में है। कारण श्रीनगर में मौजूद मेडिकल काॅलेज अस्पताल सेना के सुपुर्द किया जाना।
पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने में नाकाम हो चुकी सरकार को अब सेना का ही आसरा है। पिछले 17 सालों में अब तक राज करने वाली सभी सरकारों के पहाड़ों पर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं। केवल ट्रांसफर पोस्टिंग कर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की बात कही जाती रही है लेकिन हकीकत पहाड़ की जनता और राजनेता दोनों ही भलीभांति जानते हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की नाकाम कोशिश के बाद थक हारकर सरकार ने श्रीनगर मेडिकल काॅलेज अस्पताल सेना के हवाले करने का निर्णय लिया। सरकार जानती है कि सेना ने कभी भी किसी भी मोर्चे पर जनता को निराश नहीं किया है। अगर श्रीगर मेडिकल काॅलेज अस्पताल की दशाओं में सुधार हो गया तो काफी हद तक गढ़वाल की जनता को राहत मिलेगी।

श्रीनगर संयुक्त चिकित्सालय का भी कुछ करो साहब


मेडिकल काॅलेज की हालत तो सेना को देने के बाद सुधर जायेगी लेकिन श्रीनगर में ही स्थित संयुक्त चिकित्सालय का क्या होगा? यह अस्पताल भी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। दुर्दशा डाॅक्टरों या अन्य स्टाफ की वहज से नहीं बल्कि अस्पताल में मौजूद अधिकांश उपकरण बाबा आदम के जमाने के हैं। अस्पताल की बिल्डिंग की हालत भी बेहद खराब हैं।
श्रीनगर संयुक्त अस्पताल में गोल्ड मेडिलिस्ट डाॅक्टर भी हैं, नर्स, फार्मासिस्ट और वार्ड ब्वाय भी हैं। लेकिन नहीं हैं तो सुविधाएं।

जीं हां 2018 के इस आधुनिक दौर में भी अस्पताल में आधुनिक उपकरणों का अभाव है।
ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल होने वाले औजारों को धोने साफ करने वाली भी काफी पुरानी है। जबकि आजकल नई तकनीक की कई मशीनें आ चुकी हैं। बाकी अस्पताल की छोड़िए आॅपरेशन थियेटर की छत के हाल बुरे हैं। स्टेचर अन्य सामान को भी बदलने की जरूरत है। अस्पताल की दीवारों का पलस्तर झड़ रहा है, और भी बहुत कुछ है, जिसमें सुधार की गुंजाइश है। जिनमें सुधार की सख्त आवश्यकता है।


माना कि कुछ डाॅक्टरों ने स्वास्थ्य विभाग का मजाक बनाया हुआ है और निजी क्लीनिक खोलकर अपनी कमाई में लगे हैं। लेकिन साहब सभी डाॅक्टर एक जैसे नहीं होते। कुछ पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रहे हैं। जिन अस्पतालों में डाॅक्टर हैं, उनमें सुविधाएं भी दीजिए ताकि वह अपने पेशे से न्याय और मरीजों को राहत दे सकें। केवल डाॅक्टरों का ट्रांसर्फर कर अस्पतालों की दशा में सुधार होने वाला नहीं है।

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