सचमुच चौंक उठेंगे आप भी! उत्तराखंड के इन गांवों में   आज भी है मालगुज़ार व्यवस्था 

गिरीश गैरोला पुराने कबीलाई सभ्यता के समय से चली आ रही मालगुज़ारी  व्यवस्था भले ही 1972 मे काला कानून घोषित होने के बाद समाप्त हो गयी हो, किन्तु उत्तराखंड के जिला उत्तरकाशी के पाँच गांव रैथल मे आज भी यह व्यवस्था कायम है।· गांव के ही महेंद्र सिंह कपूर ने बताया कि राजशाही से पूर्व […]

गिरीश गैरोला
पुराने कबीलाई सभ्यता के समय से चली आ रही मालगुज़ारी  व्यवस्था भले ही 1972 मे काला कानून घोषित होने के बाद समाप्त हो गयी हो, किन्तु उत्तराखंड के जिला उत्तरकाशी के पाँच गांव रैथल मे आज भी यह व्यवस्था कायम है।·
गांव के ही महेंद्र सिंह कपूर ने बताया कि राजशाही से पूर्व राणा गंभीरू जैसे बीर भड़ों के समय से चली आ रही व्यवस्था बदलते समय मे कुछ  सुधारों के साथ आज भी मौजूद है और ग्रामीणों को इससे फायदा ही हुआ है।
 बताते चलें कि कबीला युग मे बलशाली भड़ को पंच अथवा मालगुज़ार बनाकर उसे राजा की सभी शक्तियां  दे दी जाती थी।
 पंच के फैसले का विरोध करने पर हुक्का-पानी बंद जैसी सजा बहुत समय तक प्रचलन मे रही। उन्होने बताया कि स्थानीय शमेस्वर  देवता, और माँ जगदंबा गांव के सभी ब्राहमण , बाजगी समुदाय की  सहमति से मालगुज़ार का चयन किया जाता था और इन्हे  मुनादी के लिए एक प्रहरी भी दिया जाता था जो  पंचायत के फैसले को पूरे गांव मे सुनाने का काम करता था।
 उस वक्त शासन की सभी शक्तियां मालगुजारी अथवा सयाणाचारी व्यवस्था मे ही निहित थी। ग्राम  देवता की  आज्ञा का पालन सायणा अथवा मलगुजार को करना होता था और बाकायदा प्रहरियों द्वारा इसकी मुनादी गांव भर मे की जाती थी।
 राजशाही के बाद  इस व्यवस्था मे परिवर्तन कर इसे कानूनी अमलीजामा पहनाया गया और इन्हे तब से सरपंच कहा जाने लगा।
हालांकि 1972 मे मालगुजारी व्यवस्था पर प्रतिबंध लगा दिया गया।किन्तु उत्तराखंड के  सुदूरवर्ती पहाड़ी  गांवों मे आज भी ये व्यवस्था कुछ सुधारों  के साथ कायम है।
उत्तरकाशी टकनोर क्षेत्र के पाँच गाव रेथल, नटिन, बंद्राणी , भटवाडी और क्यार्क मे आज भी यह परंपरा चली आ रही है और आज भी ये पाँच गांव पंचगाई के नाम से जाने जाते हैं।
बदलते दौर मे पंचगाई के गांवों ने कुछ सुधारों के साथ मालगुजारी व्यवस्था को आज भी जीवित रखा हुआ है।  गांव के ही महेंद्र सिंह कपूर की माने तो सभी गांवों से किसी बुद्धिजीवी और प्रभावशाली व्यक्ति को चुना जाता है। जिसके लिए उन्हे कोई भी वेतन नहीं दिया जाता।
 ये लोग पूरी तरह से सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं और पहाड़ों की संस्कृति और परम्पराओं के संरक्षण की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभाने का काम कर  रहे हैं। पौराणिक मेले-थौलु का समय पर रीति रिवाजों के अनुरूप आयोजन करना इनकी प्राथमिकता मे शामिल है। इतना ही नहीं गांव की रकीत अर्थात कृषि और फलों की फसल की सुरक्षा और रखरखाव  की ज़िम्मेदारी भी इन्ही मालगुजारों के कंधों पर है।
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