नाबार्ड और NABCONS की पहल: सॉंग नदी बेसिन में कार्बन क्रेडिट से किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम

देहरादून, 10 अप्रैल 2026/रिपोर्ट -नीरज उत्तराखंडी

उत्तराखंड में किसानों की आय वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है।

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) तथा NABCONS के संयुक्त प्रयासों से राज्य में पहली बार कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं पर विस्तृत अध्ययन प्रारम्भ किया गया है।

यह पहल विशेष रूप से देहरादून और टिहरी जनपद के सॉंग नदी बेसिन क्षेत्र पर केंद्रित है।

9 अप्रैल 2026 को सचिव, जलागम की अध्यक्षता में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में इस अध्ययन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए।

यह अध्ययन फरवरी माह में सारा (State Watershed Agency) और NABCONS के बीच हुए अनुबंध के तहत किया जा रहा है।

बैठक में सचिव श्री जावलकर ने स्पष्ट निर्देश दिए कि तैयार की जाने वाली रिपोर्ट को इस प्रकार विकसित किया जाए कि वह राज्य के विभिन्न विभागों के लिए एक मानक प्रोटोकॉल और मार्गदर्शिका के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सके।

उन्होंने कहा कि कार्बन क्रेडिट केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय में स्थायी वृद्धि का एक नया रास्ता भी खोल सकता है।

इसलिए अध्ययन में तकनीकी, आर्थिक और विपणन (मार्केटिंग) के सभी पहलुओं को शामिल किया जाए, ताकि इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सके।

बैठक में NABCONS दिल्ली की टीम, नाबार्ड देहरादून के उप महाप्रबंधक (DGM), सारा की अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीमती कहकशाँ, उपनिदेशक डॉ. डी.एस. रावत तथा अन्य विषय विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

मैदानी स्तर पर शुरू हुआ कार्य

इस पहल को जमीनी स्तर पर परखने के लिए 10 अप्रैल को टिहरी जनपद के रिंगलगढ़ क्षेत्र में संयुक्त टीम द्वारा क्षेत्र भ्रमण किया गया।

इस दौरान सारा देहरादून के विशेषज्ञों और NABCONS टीम ने ग्रामीणों से संवाद स्थापित कर पिरुल (चीड़ की सूखी पत्तियों) से बनने वाले बायोचार और उससे उत्पन्न होने वाले कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं का आकलन किया।

ग्रामीणों को बायोचार, पिरुल आधारित ब्रिकेट्स और कृषि वानिकी जैसे उपायों के बारे में जानकारी दी गई और उनके व्यावहारिक लाभों पर चर्चा की गई।

सॉंग नदी बेसिन: कार्बन क्रेडिट का उभरता मॉडल

सॉंग नदी बेसिन में कार्बन क्रेडिट आधारित मॉडल को चार प्रमुख घटकों पर विकसित किया जा रहा है—

1. एग्रोफॉरेस्ट्री (कृषि वानिकी)

खेतों की मेड़ों और खाली भूमि पर वृक्षारोपण कर किसान दोहरा लाभ ले सकते हैं। शीशम, सागौन, बांस और फलदार वृक्षों के माध्यम से प्रति हेक्टेयर 2 से 8 टन CO₂ तक कार्बन अवशोषण की संभावना जताई गई है। इससे किसानों को उत्पादों के साथ-साथ कार्बन क्रेडिट से अतिरिक्त आय भी मिल सकती है।

2. मृदा कार्बन (SOC) में वृद्धि

जैविक खेती, हरी खाद, फसल अवशेष प्रबंधन और न्यूनतम जुताई जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इससे मिट्टी की उर्वरता, जल धारण क्षमता और उत्पादन क्षमता में सुधार होता है, साथ ही कार्बन क्रेडिट भी उत्पन्न होते हैं।

3. बायोचार: दीर्घकालिक कार्बन संचयन

पिरुल और कृषि अपशिष्ट से तैयार बायोचार मिट्टी में कार्बन को सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रखता है। अनुमान है कि एक टन बायोचार लगभग 2–3 टन CO₂ के बराबर कार्बन को स्थायी रूप से संग्रहित कर सकता है। सॉंग बेसिन में पिरुल की प्रचुर उपलब्धता इसे बड़े स्तर पर लागू करने के लिए अनुकूल बनाती है।

4. पिरुल आधारित ब्रिकेट्स

पिरुल से तैयार ईंधन ब्रिकेट्स ग्रामीणों के लिए आय का नया स्रोत बन सकते हैं। इससे जंगलों में आग की घटनाओं में कमी, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता में कमी आएगी। स्वयं सहायता समूह (SHGs) और किसान उत्पादक संगठन (FPOs) इसके उत्पादन और विपणन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया आधार

इस पहल के तहत “कार्बन क्रेडिट क्लस्टर मॉडल” विकसित करने की योजना है, जिसमें एकीकृत रूप से इन सभी गतिविधियों को लागू किया जाएगा। इससे—

  • किसानों को प्रत्यक्ष आय का नया स्रोत मिलेगा
  • स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे
  • महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी सुनिश्चित होगी
  • पर्यावरण संरक्षण और जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा मिलेगा

मार्केटिंग और पारदर्शिता पर जोर

कार्बन क्रेडिट के सफल विपणन के लिए MRV (Monitoring, Reporting, Verification) प्रणाली विकसित की जा रही है। इसके माध्यम से कार्बन संचयन का वैज्ञानिक सत्यापन किया जाएगा, जिससे किसानों को पारदर्शी और सुनिश्चित लाभ मिल सके।

सॉंग नदी बेसिन में शुरू की गई यह पहल उत्तराखंड के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने का एक नया और टिकाऊ मॉडल प्रस्तुत करती है, बल्कि राज्य को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी बनाने की दिशा में भी एक मजबूत कदम है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य पर्वतीय क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

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