जूठन उठाते बीएसएनएल की कहानी

गिरीश गैरोला// भारत संचार निगम लिमिटेड याने बीएसएनएल की लचर हालात को देखते हुए यूं ही लोगों ने इसे ‘भाई साहब नही लगेगा’ का तमगा दिया है। एक समय दूरसंचार  क्षेत्र में अपना परचम लहराने वाली बीएसएनएल आज प्रतिस्पर्धा की कतार में सबसे पीछे घुटनो के बल  पर खड़ी दिखाई देती है। आलम ये है […]

गिरीश गैरोला//

भारत संचार निगम लिमिटेड याने बीएसएनएल की लचर हालात को देखते हुए यूं ही लोगों ने इसे ‘भाई साहब नही लगेगा’ का तमगा दिया है। एक समय दूरसंचार  क्षेत्र में अपना परचम लहराने वाली बीएसएनएल आज प्रतिस्पर्धा की कतार में सबसे पीछे घुटनो के बल  पर खड़ी दिखाई देती है। आलम ये है कि जहां जियो एयरटेल के प्रचार बैनर ऊंची इमारतों पर उसकी शान बढ़ा रहे हैं,  वहीं बीएसएनएल का प्रचार बैनर टेबल क्लॉथ बनकर दिहाड़ी मजदूरों और सब्जी मंडी के दुकानदारों के जूठे ग्लास थामे हुए हैं।

 

उत्तरकाशी जिला मुख्यालय में गंगोत्री राजमार्ग पर सब्जी मंडी के पास दिहाड़ी मजदूरों के चाय नाश्ते की टेबल कवर बना बीएसएनएल का बैनर आजकल खूब चर्चा में बना हुआ है। चाय की चुस्कियों के साथ यहाँ पर देश की आर्थिक हालात, महंगाई, और चुनावी हार – जीत के समीकरणों पर खूब चर्चा होती है । अगर चर्चा नही हो तो तो देश भर में सरकारी दामाद बनी भारत सरकार के उपक्रम बीएसएनएल की दुर्दशा पर। इस दौरान जूठे चाय के गिलासों का भार तो बैनर किसी तरह थाम लेता है किंतु बीएसएनएल के नाम और बैनर पर लगने चाय- समोसे और सॉस के दाग 10 रु के सर्फ एक्सेल से भी नही धुलने वाले।

उत्तराखंड के चार धाम में से गंगोत्री और यमनोत्री दो धाम अकेले उत्तरकाशी जनपद में मौजूद है।उत्तरकाशी आपदा ग्रसित जनपद भी है। जहाँ संचार तंत्र और भी बेहतर होने की जरूरत है। सभी गांवों को  इंटरनेट से जोड़ने की भारत सरकार की पहल पर भी बीएसएनएल की सांसें अभी से फूलने लगी है। जबकि जियो और भारती एयरटेल बीएसएनएल से ही स्पेक्ट्रम लेकर दौड़ में  उससे कहीं आगे निकल चुके हैं। संचार सुविधा और  इंटरनेट सुविधा को लेकर संचार मंत्रालय कितना संवेदन शील है।

इसका उदाहरण सीमांत चीन से लगे जनपद उत्तरकाशी में देखा जा सकता है, जहाँ एक भी रेगुलर एसडीओ तैनात नही किया गया है। हाल ही में जेई से जेटीओ में प्रमोट हुए कर्मचारी को ही एसडीओ का प्रभार सौंप कर अधिकारी ही खाना पूर्ति करने में लगे है। बिना स्टाफ के टिहरी जिले के नागराजधार से धौंत्री बड़ेथ तक, धौंत्री कमद के नैड से चौरंगी तक, उत्तरकाशी से भटवाडी और संगमचट्टी तक की जिम्मेदारी एक अकेले एसडीओ के ऊपर है और वह भी नही है, प्रभारी को जिम्मेदारी दी गयी है। इतने बड़े इलाके में लाइन की देखभाल के लिए दौड़भाग के लिए न तो पर्याप्त स्टाफ है और न पर्याप्त धन। बस समझ लीजिए काम करते हुए दिखना भर है, काम हो न हो ।

देश भर के गांवों को संचार और नेट सुविधा से जोड़ने का दावा करने वाली सरकार चीन सीमा की तरफ भटवाडी से आगे ओएफसी नही बिछा सकी है। आलम ये है कि टावर रेडियो फ्रीक्वेंसी पर न चलकर सेटेलाइट से चलाए जा रहे हैं, जिसमे न तो वाॅइस काल ही बेहतर मिलती है और न ही डेटा।

ऐसा नही है कि देहरादून सर्कल में बैठे सीजेएम को हालात का पता नही है, किंतु वह भी सेवा निवृति का समय पास देख किसी विवाद में पड़ना नही चाहते है। संचार मंत्रालय से कोई सख्त आदेश हो तो कुछ हलचल हो किन्तु प्रतिस्पर्धा के दौर में बीएसएनएल लोगों की जुबान से ही हट चुका है। यही कारण है कि ऑनलाइन शिकायत सुविधा होने के बाद भी कोई शिकायत नही होती है। कोई भी अधिकारी इस ढर्रे को बदलने की हिम्मत दिखाने को तैयार नही। उन्हें डर है कि स्टाफ को ट्रांसफर कर इधर-उधर भेजा तो कर्मचारी यूनियन के झंडे डंडे फिर से बाहर निकल जाएंगे। लिहाजा bjp सरकार में “जै विधि राखे राम तै विधि रहियो” पर अमल हो रहा है।

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