गोरों ने समझा था ” गैरसैण का महत्व ” अपने ही भूल गये ।

क्रांति भट्ट ” गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने की मांग केवल भावनात्मक उद्वेग नहीं है । यहां की नैसर्गिक सुन्दरता और प्रशासनिक ब्यवस्था के ” गैरसैण ” के महत्व को गोरों ने अर्थात भारत में जब ब्रिटिश हुकूमत थी । तब अंग्रेज अफसरों ने भी समझा था । और ” गैरसैण के नजदीक ललोहबा […]

क्रांति भट्ट
” गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने की मांग केवल भावनात्मक उद्वेग नहीं है । यहां की नैसर्गिक सुन्दरता और प्रशासनिक ब्यवस्था के ” गैरसैण ” के महत्व को गोरों ने अर्थात भारत में जब ब्रिटिश हुकूमत थी । तब अंग्रेज अफसरों ने भी समझा था । और ” गैरसैण के नजदीक ललोहबा में ” पेशकारी कार्यालय ” खोल कर एक प्रकार से उत्तराखंड राज्य की राजधानी के शुभ लक्षणों की नींव डाली थी ।
उत्तराखंड राज्य के लिए सत्तर के दशक से शुरू हुये संघर्ष और उसके बाद राज्य की राजधानी ” गैरसैण ” बनाने के आन्दोलन , जो अभी भी जारी है । इस संघर्ष का निसंदेह अपना प्रतिदिन लिखा जाने वाला इतिहास है । इसी जन दबाव के कारण राज्य बनने पर सरकार में आये दलों को गैरसैण में विधान सभा भवन , सत्र , कैबनेट का आयोजन करना पडा है और राजनीति तथा सरकार बनानी है तो ” गैरसैण जरूरी ” है । हालांकि राजधानी के मसले पर ” आधी श्रद्धा ” है ।
पर इतिहास के पन्ने पलटें तों गैरसैण को प्रशासनिक ब्यवस्था का केन्द्र बनाने की नींव ” ब्रिटिश काल ” में अंग्रेज अफसर डाल गये थे ।लोहबा जो गैरसैण का क्षेत्र है । लोहबा गढ की राजशाही का बडा महत्व एक लम्बे समय तक रहा ।यहाँ के लोग शारीरिक बल के लिए बहुत मायने रखते थे । 1865 के अफगान युद्ध में बीरता दिखने के कारण यहाँ के लोगों को ” मार्शल रेस ” उपाधि शब्द का प्रयोग पहली बार किया गया ।तत्कालीन चांदपुर परगने की पट्टी होने के कारण लोहबा गैरसैण को बड़ा महत्व मिलता था ।वरिष्ठ पत्रकार रमेश पहाड़ी लिखते हैं कि लोहबा गैरसेण की समृद्धि , अनकूल जलवायु , सुरम्यता तथा नैनीताल से आसान पहुंच के कारण इस क्षेत्र को अंग्रेज सरकार ने महत्व दिया । और श्रीनगर तहसील के साथ ही ” लोहबा गैरसैण ” में प्रशासनिक ब्यवस्था के लिये तत्कालीन प्रशासनिक ब्यवस्था की महत्वपूर्ण इकाई ” पेशकारी ” की स्थापना की ।
जिसमें नायब तहसीलदार स्तर का एक अधिकारी तैनात किया गया ।
पुराने कागजों और दस्तावेजों व लोक धारणों कै बटोरें तो महत्वपूर्ण जानकारी ” गैरसैण ” के बारे में मिलती है ।यहां ” सिलकोट टी स्टेट समेत कुछ और टी स्टेट थीं जो चाय बागान थे ।इस लिए अंग्रेजों ने लोहबा गैरसैण को चाय उत्पादन का सेन्टर भी बनाया ।इसे चाय बागान का मुख्यालय बनाया गया । स्थान के महत्व को देखते हुये लोहबा गैरसैण में एक मिशन स्कूल भी बनाया गया ।तत्कालीन कमिश्नर ” लुश्टिंगन ” ने तत्कालीन गढवाल जिले का मुख्यालय ” लोहबा गैरसैण ” बनाने का प्रस्ताव प्रांतीय सरकार को भेजा था । पत्रकार रमेश पहाड़ी बताते हैं कि हालांकि यह प्रस्ताव मंजूर नहीं हुआ । मगर असिस्टेंट कमिश्नर और तहसीलदार समय समय पर यहाँ पर कैम्प लगाकर सरकारी काम काज निपटाते थे ।कुछ लोगों का मानना है कि यहाँ पेशकारी 1914 तक रही ।पर दूसरे दस्तावेज यह बताते हैं कि तत्कालीन कमिश्नर हेनरी रैमजे जिन्होंने ने रिकॉर्ड समय 28 वर्ष तक कमिश्नरी सम्भाली ने पहले कैन्यूर तहसील व लोहबा गैरसैण की पेशकारी को समाप्त किया । यह समय 1879 का है । पर लोहबा गैरसैण के महत्व को बरकरार रखा ।


गैरसैण के आस पास के चाय बगान जिन्हें टी स्टेट कहते थे और यहाँ से जुड़े अन्य चाय बागानों की कहानी फिर कभी आगे । आसाम से ज्यादा महत्वपूर्ण थी कभी यहाँ की चाय और चाय बागान ।

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