राज्यवासियों के हितों पर प्रहार :ई टेंडर और टर्न ओवर नए हथियार

विनोद कोठियाल लंबे समय तक धरने और कार्मिक अनशन के बाद आखिरकार प्रदेश में ठेकेदार एसोशियेशन की हड़ताल खत्म हुई। रुड़की विधायक सुरेन्द्र सिंह राठौर तथा प्रमुख अभियन्ता लोक निर्माण विभाग द्वारा जूस पिला कर 31 दिनों से चला आ रहा क्रमिक अनशन दिनांक  19 मार्च को भले ही समाप्त हो गया है परन्तु इतने […]

विनोद कोठियाल

लंबे समय तक धरने और कार्मिक अनशन के बाद आखिरकार प्रदेश में ठेकेदार एसोशियेशन की हड़ताल खत्म हुई। रुड़की विधायक सुरेन्द्र सिंह राठौर तथा प्रमुख अभियन्ता लोक निर्माण विभाग द्वारा जूस पिला कर 31 दिनों से चला आ रहा क्रमिक अनशन दिनांक  19 मार्च को भले ही समाप्त हो गया है परन्तु इतने लम्बे समय तक चला धरना और कार्मिक अनशन प्रदेश सरकार की संवेदनशीलता पर कई प्रश्न खड़े कर गया।

डबल इंजन सरकार जीरो टालरेंस के जुमले के पीछे इतनी असंवेदनशील हो गयी है कि नीति बनाने के पीछे प्रदेश के विषम भौगोलिक स्थिति का भी जरा भी खयाल नहीं रखा जा रहा है। एक ओर पहाडों पर हो रहे पलायन को रोकने के लिए ऐडी चोटी के जोर लगाये जा रहे हैं वहीं दूसरी और पहाडों पर रोजगार के अवसरों को समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जहां पहाडों में खेती करना अब कम बारिश और जंगली जानवरों के कारण कोई फायदे का सौदा नहीं रहा। संसाधनों के अभाव में कोई उद्योग नहीं लगाया जा सकता है ठेकेदारी एकमात्र आजीविका का बड़ा साधन बना है ।इस बात को पहाडों से आने वाले विधायकों को अच्छी तरह से जानकारी है। जब प्रदेश में डबल इंजन की सरकार बनी तो सरकार के मुखिया ने सबसे पहले यही घोषणा की कि अब छोटे कार्य स्थानीय लोगों द्वारा करायें जायेंगे तब प्रदेश के सभी लोगो में उत्साह था कि शायद अब रोजगार बढेंगे। परन्तु डबल इंजन सरकार का पहिया एक साल की दूरी तय करने के बाद भी ऐसा कुछ नहीं कर सकी ।विभागीय नीतिनिर्माताओ द्वारा छोटे कार्यो के भी ई टेंडरिग की प्रक्रिया बना कर स्थानीय लोगों का रोजगार के अवसर कम करके बाहरी व्यक्तियो के लिए प्रवेश आसान कर दिया। लोक निर्माण विभाग के मुखिया खुद मुख्यमंत्री है और प्रदेश के मुख्यमंत्री को पहाड़ के भूगोल के अनुरूप निति न बनाना यह दर्शाता है कि उन्हें पहाड़ की दशा का ज्ञान नहीं है।

ठेकेदार एसोशियेशन की हड़ताल को पहाड़ से आनेवाले सभी विधायकों का समर्थन हासिल था।क्योंकि इनके समर्थन में मुन्ना सिंह चौहान,और  मन्त्री हरक सिंह रावत द्वारा खुल कर पैरवी भी की गयी। इस सम्बन्ध में मुन्ना सिंह चौहान का कहना है कि जब सरकार रोजगार देने की कंडीशन मे नहीं है तो रोजगार छीनना भी नही चाहिए। करीब चालीस से ज्यादा विधायकों चाहे सत्तापक्ष हो या विपक्ष सभी का समर्थन हासिल था। राजनैतिक नफा नुकसान का हिसाब किताब सभी पहाड़ से आने वाले विधायकों को अच्छी तरह से पता है कि पहाड़ में वोट को प्रभावित करने वाले सबसे अधिक ठेकेदार वर्ग या स्थानीय लोग हैं यदि इनका रोजगार पर आंच आयी तो हमारे वोट पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए सभी विधायक इस सम्बन्ध में कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि मुख्यमंत्री को मैदानी क्षेत्र से चुनाव लड़ना है जहां अधिकतर वोटर नौकरी पेशा वाले लोग हैं परन्तु हम तो चुनाव में उन लोगों के बीच जाना है जहां आय के स्रोत छोटे कामधन्धे और ठेकेदारी ही है। अब सवाल यह है कि प्रदेश से बाहर के व्यक्ति को ई निविदाओं के माध्यम से अन्दर आने का खुला निमन्त्रण किसकी सह पर हो रहा है। अभी आग केवल लोक निर्माण विभाग तक है।

यह आने वाले समय में यह बड़ा रूप भी ले सकती है। उदाहरण के रूप में नयी आबकारी नीति में ट्रनओवर पांच करोड़ करके सरकार ने साफ सन्देश दे दिया है कि स्थानीय लोगों की कुछ नहीं सुनी जायेगी। मामला काफी गम्भीर है यदि प्रदेश वासियों के हितों को सुरक्षित रखना है तो इस पर एक नए आन्दोलन की आवश्यकता है ।

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