गंगोत्री मे शुरू आलवेदर पर्यटन ! सैलानी चुस्त, सरकार सुस्त

बदलने लगी है परिभाषा। गंगोत्री धाम में कपाट बंद होने के बाद भी पर्यटकों की आवाजाही जारी । उत्तरकाशी/ गिरीश गैरोला  आमतौर पर चार कपाट बंद होने के बाद चारधाम में सन्नाटा छा जाता है किंतु लगता है अब पर्यटन की परिभाषा भी बदलने लगी है और लोग खुद पर्यटन के नए मायने निकालने में […]

बदलने लगी है परिभाषा।
गंगोत्री धाम में कपाट बंद होने के बाद भी पर्यटकों की आवाजाही जारी ।
उत्तरकाशी/ गिरीश गैरोला 
आमतौर पर चार कपाट बंद होने के बाद चारधाम में सन्नाटा छा जाता है किंतु लगता है अब पर्यटन की परिभाषा भी बदलने लगी है और लोग खुद पर्यटन के नए मायने निकालने में लगे हैं। तभी तो गंगोत्री मंदिर के कपाट होने के बाद बर्फबारी और कड़ाके की सर्दी के बाद भी लोग अपने बच्चों सहित गंगोत्री मंदिर के दर्शन के लिए निकल रहे हैं ।
पहाड़ों में बाइकर्स ने भी रोमांचक पर्यटन की नई परिभाषा गढ़ी है। बाइक से सुदूर पहाड़ियों का सफर रोमांचक तो होता ही है यहां से लिए गए फोटोग्राफ्स सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनल के माध्यम से अन्य लोगों को भी यहां आने का न्योता देते हैं । पर्यटन को लेकर सरकार से अपेक्षा करने से पूर्व स्थानीय लोग खुद से पहल करें और ऑफ सीजन में धाम में पहुंचने वाले यात्रियों को खाने और रहने की व्यवस्था करे तो पहाड़ो में भी पर्यटन को चार चांद लग सकते हैं ।
उत्तरकाशी से गंगोत्री हर्शिल की तरफ का सफर नैसर्गिक सुंदरता से भरपूर है। सुंदर पहाड़ियों के बीच भागते दरख़्तों के बीच चलने का एहसास अपने आप में अनूठा है। सामने दिखती बर्फ की चांदनी से ढकी पहाड़ियां इंसान के अंदर ठंड का खौफ समाप्त कर उसे बर्फ में अठखेलियां करने को आकर्षित करती हैं। पहाड़ की सर्पीली  सड़कें ऑफ सीजन में एक नया दृश्य पेश करती हैं।
 गंगोत्री में इस समय तमाम सरकारी कार्यालय बंद है।  व्यापारिक प्रतिष्ठान भी पूरी तरह से बंद है और सड़क पर बर्फ बिछी हुई है। संभल कर चलना बेहतर होगा। क्योंकि इसमें फिसलन हो सकती है और आप चोटिल हो सकते हैं। लिहाजा पहाड़ों की तरफ यात्रा से पूर्व कपड़ों और जूतों का सही चुनाव जरूरी है।
शीतकाल के छह महीने जब गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं और लोगों की आवाजाही पूरी तरह से रुक जाती है,  उसके बावजूद गंगोत्री इलाके में कुछ साधु साधना के लिए निवास करते हैं और 6 महीने बर्फ के बीच साधना करते हैं ।
गंगोत्री में ब्रह्मचारी महेश चैतन्य ने बताया कि साधना कैसे करते हैं यह बताने वाली बात नहीं हो सकती। एक अनुभव है। रही भोजन की बात , उन्होंने कहा कि जब इंसान ईश्वर प्राप्ति के उद्देश्य से गंगोत्री पहुंच जाता है तो कहीं न कहीं उसकी व्यवस्था हो ही जाती है।
गौरी कुंड  आश्रम में रहने वाले बाबा पपानंद महाराज ने बताया कि गंगोत्री से लेकर तपोवन तक करीब 42 बाबा बर्फ के बीच में यहीं साधना में लगे हैं। बर्फ के दिनों के 6 महीने का राशन एडवांस में आश्रमों में रख दिया जाता है ।
हरिद्वार से पहुंचे पर्यटक वैशाली अग्रवाल ने बताया कि यहां की शांति और सुंदर पहाड़ियां उन्हें यहां खींच लाई हैं। हरसिल का राम तेरी गंगा मैली फिल्म का पोस्ट ऑफिस और सुंदर घटिया उन्हें आकर्षित करती हैं। उनका मानना है कि ऑफ सीजन में भी यहां कुछ दुकानें खुली रहें तो शीतकाल में बर्फबारी के बीच भी पर्यटकों की यहां पर  आवाजाही बनी रह सकती है ।
किशोर पर्यटक सक्षम शर्मा ने बताया कि आमतौर पर वीडियो गेम और ऑन लाइन इंटरनेट में लगे रहने वाले युवा भी यहां की सुंदर पहाड़ी मे अपने आप में खो चुके हैं। पहाड़ों के बीच से निकलने वाली छोटी-छोटी नदियां उन को आकर्षित करती हैं साथ ही सुंदर और स्वच्छ पर्यावरण उन को लुभा रहा है।
 मंदिर कैंपस से पहले आप देख सकते हैं कि सड़क पर गिरी हुई बर्फ के बीच किस तरीके से पर्यटक चाहे वह बच्चे हो या बड़े एक दूसरे पर बर्फ फेंक कर अपनी खुशी का इजहार करते हैं। मानो प्रकृति को इस सुंदर नियामत के लिए धन्यवाद कर रहे हों। मंदिर के कपाट बंद हो गए हैं लेकिन फिर भी पर्यटकों का मंदिर में आना जाना बराबर बना हुआ है।  मंदिर के मंदिर कैंपस में भी अच्छी बर्फवारी है।  जहां लोग बर्फ का आनंद ले रहे हैं। मंदिर में सुरक्षा के नाम पर कुछ चौकीदार और कुछ फक्कड़  बाबा रहते हैं और प्रसाद के नामपर लोगों को चाय देते है। इन्हें ऐसे ही वहां पर लगातार जलती लकडियों के सहारे 6 महीने का समय काटना है।  यात्रियों के लिए कोई दुकान खुली नहीं है।
मंदिर के सामने बर्फबारी का आनंद ले रहे हरिद्वार से आए  पर्यटकों ने बताया कि हालांकि सर्दी को देखते हुए पहले घरवाले आने की इजाजत नहीं देते हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि गंगोत्री धाम श्रद्धा का प्रतीक के साथ नैसर्गिक सुंदरता का प्रतीक भी है और यहां आने के बाद जो उन्हें यहां महसूस हुआ है, उसे शब्दों मे बयां नही किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि  पर्यटन विभाग  को कम से कम 9 महीने तक यहां आवाजाही बनाए रखनी चाहिए, ताकि पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।
 देहरादून से आए हुए दूसरे पर्यटक ने बताया कि पहाड़ों का सफर भले ही तकलीफ और थकान देने वाला हो किंतु बर्फ के मिलते ही पूरी थकान दूर हो जाती है। उन्होंने कहा कि पहले की तुलना में अब घर के बड़े बुजुर्ग भी ऑफ सीजन में पहाड़ों की यात्रा की अनुमति देने लगे हैं। कह सकते हैं कि धीरे-धीरे पहाड़ों में पर्यटन की परिभाषा बदलने लगी है।
 गंगोत्री मंदिर के घाट का नजारा आप देख सकते हैं। यह वही घाट है, जहां पर पंडा समाज पितरों के निमित्त पूजा अर्चना गंगा तट पर करवाते हैं। गंगा के दूसरी तरफ काफी आश्रम हैं । चारधाम के कपाट बंद होने के बाद लोगों की आवाजाही पूरी तरह से बंद है लेकिन फिर भी करीब 42 की संख्या में बाबा अभी भी गंगोत्री  में रहकर साधना करते हैं। हम देख पा रहे गंगा नदी सिकुड़ गई है। पत्थरों पर भी बर्फ जमी हुई है। और नदी भी जमने वाली है  आने वाले कुछ दिनों में पूरी तरह से नदी का पानी जम कर पर बर्फ बन जाएगा इतना सख्त कि उसको आप आसानी से पार भी कर सकते हैं । इन घाटों पर भी पर्यटकों की तादाद लगातार बर्फ का आनंद ले रही है ।  एक दूसरे पर बर्फ कि गेंद बनाकर उछाल रहा है। लगता है कि ठंड का नामोनिशान नहीं है यहां।

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