खबर का असर : विश्वविद्यालय से बेआबरू हुई विदाई

अधिकारी तीन माह से बिना वेतन के कार्य कर रहा है  अंततः पर्वतजन की मुहिम रंग लाई भ्रस्ट अधिकारी मुकुल काला की हुई उत्तराखंण्ड आयुर्वेद विश्विद्यालय से हुई रवानगी  ताला तोड़ कमरे से जबरन लिया जा सकता है चार्ज और हर्जाना कटेगा वेतन से यह अधिकारी कार्यमुक्ति के आदेश के बावजूद फूल में भंवरे की […]

अधिकारी तीन माह से बिना वेतन के कार्य कर रहा है
 अंततः पर्वतजन की मुहिम रंग लाई भ्रस्ट अधिकारी मुकुल काला की हुई उत्तराखंण्ड आयुर्वेद विश्विद्यालय से हुई रवानगी
 ताला तोड़ कमरे से जबरन लिया जा सकता है चार्ज और हर्जाना कटेगा वेतन से
यह अधिकारी कार्यमुक्ति के आदेश के बावजूद फूल में भंवरे की तरह विषविद्यालय से चिपका था


अन्ततः उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय से वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मुकुल काला की हुई विदाई।
बड़े वेआबरु होकर तेरे कूचे से निकले सनम की तर्ज पर उक्त अधिकारी की हुई विदाई, ज्ञात हो उक्त विश्वविद्यालय में अपने योगदान के समय से ही भारी विवादो और भरस्टाचार का पर्याय रहने वाले इस अधिकारी की इस विश्वविद्यालय  से विदाई हो ही गयी जिसको हटाने में नये निजाम को भी दो माह से अधिक का समय लग गया, इस अधिकारी का पूरा कार्यकाल भारी विवादों में रहा परन्तु इसे उच्च स्तरीय भर्स्ट अधिकारियों को पूर्ण संरक्षण प्राप्त होने के कारण विश्वविद्यालय  के कुछ ईमानदार अधिकारी भ्रष्टाचार से  मुक्ति दिलाने के लिए भी पूरी निष्ठा से प्रायासरत रहने के बावजूद भी हटाने में असफल रहे परन्तु अंत में सत्यमेव जयते, इन्हें हटाने में सफल रहे जो कि बधाई के पात्र हैं क्योकि इस अधिकारी को पूर्व के बरिष्ठ अधिकारियों से लेकर बर्तमान विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी का खुला संरक्षण प्राप्त होने के कारण यह आसान नहीं था, इसे कई बार प्रतिनियुक्त के सारे नियमो को ताक पर रखकर अनियमित तरीके से से सेवा विस्तार दिया जाता रहा है, नये निजाम के हस्ताक्षेप और ईमानदार अधिकारियों के इस प्रयास से इनको संरक्षण प्रदान करने वाले  चारचार अधिकारियों के मुख पर यह जबरदस्त तमाचा है, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वर्तमान प्रशासन इनके कार्यकाल में हुए व्यापक स्तर पर हुए घोटालों पर क्या कार्यवाही करेगा।


इस अधिकारी का इस विश्वविद्यालय से इतना मोह था की अपने मूल विभाग द्वारा अक्टूबर 2017 में मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के पद पर प्राप्त पदोन्नति को भी ठुकरा कर एन केन प्रकारेण यही पर कनीय पद वरिस्ठ प्राशासनिक अधिकारी के पद परब ना रहा जबकि इस विश्वविद्यालय में वरिस्ठ प्राशासनिक अधिकारी का पद सृजित ही नहीं है परन्तु इन्हें नियम विरुद्ध इस पद पर रख कर वित्तीय क्षति पहुंचाई गई, यही नहीं इन्हें यहाँ पर सारे नियमो को ताक पर रख लेखाधिकारी के पद पर नियुक्त करने हेतु इनके मूल विभाग को लिखा गया परन्तु मूल विभाग के भारी विरोध और अनापत्ति प्रमाण नहीं देने के कारण यह सम्भव नहीं हो सका।

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